सरिता विशेष

मुलायम सिंह यादव की ताकत ही थी कि आज उन के परिवार के सदस्य लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधानपरिषद और पंचायत लैवल तक अहम जगहों पर काबिज हैं. उन के बेटे अखिलेश यादव देश के सब से बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. वे उत्तर प्रदेश के सब से कम उम्र के मुख्यमंत्री बने हैं. इस के बावजूद आज 25 साल पूरे कर रही यह पार्टी टूटने के कगार पर खड़ी है. समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह का परिवार उन की सब से बड़ी ताकत थी, जो अब उन की सब से बड़ी कमजोरी बन गई है.

विरासत का झगड़ा

बेटे अखिलेश यादव के साथ शुरू हुए झगड़े से परिवार और पार्टी दोनों ही 2 धड़ों में बंट गए हैं. हालात ये हो गए हैं कि मुलायम सिंह यादव को कहना पड़ा, ‘जो बाप का नहीं हुआ, वह बात का क्या होगा?’  बात केवल उन के कहने भर की नहीं है, क्योंकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कहा था, ‘स्कूल में मैं ने अपना नाम खुद रखा था.’ अखिलेश यादव की इस बात से यह पता चलता है कि मुलायम सिंह यादव ने बचपन में उन की कितनी परवाह की थी. इस से परिवार में खटास पैदा होने की खबरों की तसदीक होती है. मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के बीच की दूरी अखिलेश के बचपन से ही बनी हुई थी. अखिलेश यादव मुलायम सिंह की पहली पत्नी मालती देवी के बेटे हैं. अखिलेश को पिता का वह साथ नहीं मिला, जो एक बेटे को मिलना चाहिए. यही वजह है कि अखिलेश यादव का लालनपालन चाचा शिवपाल यादव और परिवार के दूसरे लोगों की मदद से हुआ.

शुरुआती पढ़ाई के बाद अखिलेश यादव राजस्थानके मिलिटरी स्कूल में चले गए. वहां से वे कर्नाटक और आस्ट्रेलिया पढ़ाई करने गए. दरअसल, पितापुत्र के बीच रिश्तों में सहज भाव की शुरू से ही कमी रही है. यह कमी इस हद तक थी कि अखिलेश यादव अपने पिता को बचपन से ही ‘नेताजी’ कह कर बुलाते थे. यह दूरी उस समय और ज्यादा बढ़ गई, जब मुलायम सिंह की जिंदगी में साधना गुप्ता आईं. साधना गुप्ता के साथ उन के रिश्ते बहुत दिनों तक समाज के सामने नहीं आए. साल 1998 के बाद खुद साधना गुप्ता ने इस बात की पहल शुरू की, जिस से उन के और मुलायम सिंह के रिश्ते समाज के सामने आ सके.

इस बीच अखिलेश यादव की शादी डिंपल के साथ हो गई. इस शादी के लिए पहले मुलायम सिंह यादव राजी नहीं थे, पर बाद में वे तैयार हो गए. यहां से पितापुत्र के बीच रिश्ते सहज होने लगे थे. साधना गुप्ता को कामयाबी तब मिली, जब साल 2003 में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और वे उन के सरकारी आवास में रहने लगीं. कुछ समय के बाद जब मुलायम सिंह की पहली पत्नी मालती देवी की मौत हुई, तो साधना गुप्ता और उन के परिवार का दखल बढ़ने लगा. साधना गुप्ता से हुआ बेटा प्रतीक यादव भी बड़ा हो रहा था. मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जब आमदनी से ज्यादा जायदाद का मामला सामने आया, तो पहली बार जनता को पता चला कि प्रतीक यादव मुलायम सिंह यादव के दूसरे बेटे हैं. प्रतीक यादवकी शादी अपर्णा यादव से हुई. तब समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं ने प्रतीक यादव को राजनीति में लाने की कोशिश की, पर उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. लेकिन कुछ समय के बाद प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव ने राजनीति में कदम रखने की इच्छा जताई, तो मुलायम सिंह ने उन को लखनऊ कैंट विधानसभा क्षेत्र से टिकट दे कर चुनाव की तैयारी करने को कहा. ऐसे में यह साफ हो गया कि मुलायम सिंह के दूसरे बेटे की पत्नी भी राजनीति में आएंगी. इस से परिवार में नई तरह का धुव्रीकरण शुरू हो गया.

अमर सिंह के दोबारा पार्टी में आने से साधना, शिवपाल और अमर सिंह के गुट ने मुलायम सिंह को दबाव में ले लिया. इस के बाद पिता मुलायम और पुत्र अखिलेश के बीच दूरी बढ़ने लगी. अभी तक हर तरह के समझौते करते आ रहे अखिलेश यादव के लिए हालात सहन करना मुश्किल हो गया और वह बगावत के रूप में सामने आ गया. अखिलेश यादव की बगावत को मुलायम सिंह यादव के ही भाई रामगोपाल यादव ने समर्थन दिया. अब मुलायमशिवपाल का एक गुट सामने आया, तो अखिलेशरामगोपाल दूसरे गुट में खड़े हो गए. अखिलेश यादव ने साफ ऐलान कर दिया कि जो अमर सिंह के साथ खड़ा होगा, वे उस के साथ नहीं होंगे. दूसरी तरफ मुलायमशिवपाल ने अमर सिंह की गलती मानने से इनकार कर दिया.

मुलायम सिंह ने साफ कर दिया कि वे अमर और शिवपाल को नहीं छोड़ सकते. अमर सिंह उन के भाई जैसे हैं. मुसीबत में अमर सिंह ने उन की बहुत मदद की थी. ऐसे में अखिलेश और शिवपाल  आमनेसामने खड़े हो गए. दोनों ही एकदूसरे को पार्टी और सरकार से बाहर का रास्ता दिखाने में जुट गए. परेशान हो कर मुलायम सिंह ने दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश की, तो बात बनतेबनते बिगड़ गई. तब मुलायम सिंह यादव ने चुप हो जाना ही बेहतर समझा. उन की कोशिश यह है कि साल 2017 के विधानसभा चुनावों तक समाजवादी पार्टी में टूटफूट न हो, जिस से पार्टी को दोनों गुटों का फायदा मिल सके.  

पार्टी के 25 साल पूरे होने पर जिस रजत जयंती समारोह के बाद समाजवादी पार्टी को नए आभामंडल को छूना था, उस समय पार्टी टूटती नजर आ रही है. इस के बाद भी मुलायम सिंह ने हार नहीं मानी और बिना किसी भेदभाव के वे अखिलेश और शिवपाल दोनों को ही समान नजर से देख रहे हैं. यह बात और है कि दोनों को ही यह नजर आ रहा है कि मुलायम सिंह उन की बात का मान नहीं रख रहे. यह मुलायम सिंह की ताकत ही है कि इतने विरोध के बाद भी हर किसी को उन की जरूरत है. इसी वजह से शिवपाल और अखिलेश दोनों कह रहे हैं कि ‘नेताजी ही हमारे नेता हैं’. 

जमीनी नेता हैं मुलायम सिंह

मुलायम सिंह अपने 5 भाईबहनों में रतन सिंह से छोटे और अभयराम सिंह, शिवपाल सिंह, रामगोपाल और कमला देवी से बड़े हैं.

मुलायम सिंह यादव को बचपन से ही पहलवानी का शौक था. जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र में हुई कुश्ती प्रतियोगिता में उन्होंने नत्थू सिंह को प्रभावित किया था. जसवंतनगर नत्थू सिंह की विधानसभा सीट थी. उन्होंने मुलायम सिंह यादव को राजनीति की तरफ बढ़ने को कहा.

इस के बाद मुलायम सिंह यादव ने राजनीति और पढ़ाई दोनों एकसाथ शुरू कीं. आगरा यूनिवर्सिटी से एमए और जैन इंटर कालेज, करहल, मैनपुरी से बीटीसी करने के बाद मुलायम सिंह ने कुछ समय के लिए स्कूल में पढ़ाने का काम भी किया. यहां से ही वे राजनीति की तरफ बढे़ और डाक्टर राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह का साथ देने लगे.

मुलायम सिंह को पहली कामयाबी तब मिली, जब साल 1977 में वे पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक बने थे. यहीं वे पहली बार जनता पार्टी सरकार में सहकारिता मंत्री भी बने थे. इस के बाद मुलायम सिंह ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और वे 3 बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक बार केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री रहे.

रहे सांप्रदायिक विरोधी

90 के दशक में जब देश में मंडल कमीशन लागू हुआ, तो मुलायम सिंह यादव पिछड़ा वर्ग के प्रमुख नेता के रूप में उभरे थे. इस के साथ ही साथ वे भारतीय जनता पार्टी की सांप्रदायिक राजनीति के विरोध में खडे़ हुए थे. भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने को ले कर आंदोलन शुरू किया, तो मुलायम सिंह यादव ने सब से पहले उस का विरोध किया था. इस के चलते कट्टरवादी ताकतों ने मुलायम सिंह को ‘मुल्ला मुलायम’ की उपाधि दे दी थी. साल 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार बरखास्त हो गई थी. इस के बाद हुए विधानसभा चुनावों में मुलायम सिंह ने बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम के साथ गठजोड़ कर के सरकार बनाई. सांप्रदायिक ताकतों का विरोध करते हुए जनता ने उस समय नारा दिया था ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’. 

उत्तर प्रदेश एक नए सामाजिक ढांचे पर खड़ा था. अगड़ी जातियों के हाथ से सत्ता चली गई थी. उस पर दलितपिछड़ों का कब्जा हो चुका था. मायावती  राजनीति में अपना एक अलग मुकाम हासिल करना चाहती थीं. भाजपा ने मायावती की इसी इच्छा को पूरा करने का सपना दिखा कर मुलायम सिंह के दलितपिछड़ा गठजोड़ को तोड़ दिया, जिस के बाद मुलायम  और मायावती के बीच ऐसी दरार बनी, जो आज तक खत्म नहीं हो सकी है.

हार नहीं मानते मुलायम

1990 के बाद राजनीति में तोड़फोड़, दलबदल और पैसे का दबदबा बढ़ने लगा. इस के बाद भी मुलायम सिंह ने कभी हार नहीं मानी. 2003 में वे तब मुख्यमंत्री बने, जब भाजपा से टूट कर कल्याण सिंह और लोकदल नेता अजित सिंह उन के साथ खडे़ हुए थे. साल 2007 तक मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. इस के बाद 2012 में समाजवादी पार्टी सत्ता में पूरे बहुमत से आई, तो उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुरसी पर बिठा कर उन को अपना सियासी वारिस ऐलान किया. साल 1993 में जब बसपा नेता कांशीराम और मायावती ने मुलायम को अपमानित कर गठबंधन तोड़ने का काम किया, तब उन्होंने किसी दल से गठजोड़ न करने का मन बना लिया. यहीं से मुलायम सिंह यादव ने अपने परिवार को राजनीति में लाना शुरू किया.

मुलायम सिंह को लगता था कि परिवार के लोग रहेंगे, तो उन से खतरा नहीं होगा. इस सोच के साथ मुलायम ने समाजवादी पार्टी में अपने भाई शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव को आगे किया. इस के बाद बेटे अखिलेश यादव और उन की पत्नी डिंपल यादव के लिए संसद में जाने का रास्ता तैयार किया.  यह सिलसिला रुका नहीं. 2014 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी से केवल मुलायम के परिवार के लोग ही संसद सदस्य बन सके. इस समय तक लोकसभा में मुलायम परिवार के तेज प्रताप सिंह यादव, अक्षय यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव और खुद मुलायम सिंह यादव लोकसभा के सदस्य बने. भाई रामगोपाल यादव राज्यसभा के सदस्य बने. परिवार में मचे घमासान के बाद भी मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव को कुछ न कहा और न भाई शिवपाल को. दोनों को समझाया और एक को सरकार की बागडोर दे दी, दूसरे को संगठन की, जिस से परिवार में होने वाली टूटन बच गई. आने वाले दिनों में अलगाव की जो गांठ परिवार में पड़ी है, उस का फंस जाना मुसीबत खड़ी कर सकता है. इस का खमियाजा समाजवादी पार्टी को ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश को भुगतना पड़ सकता है.

परिवार के विवाद का नुकसान सपा को उठाना पड़ रहा है. नेताओं के आपसी विवाद से कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे हैं कि वे किस का साथ दें.            

अखिलेशमुलायम में वार पलटवार

– अखिलेश यादव ने सब से पहले कैबिनेट मंत्री गायत्री प्रजापति और मुख्य सचिव दीपक सिंघल को हटा दिया.

– जवाब में नाराज मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया.

– मुलायम सिंह के कहने पर शिवपाल यादव प्रदेश अध्यक्ष बने.

– शिवपाल यादव ने मुलायम सिंह के खिलाफ नारेबाजी करने वाले अखिलेश समर्थक नौजवान नेताओं को हटा दिया.

– अखिलेश ने अपने समर्थकों को सपा दफ्तर से अलग लोहिया ट्रस्ट में बैठने को कहा.

– अखिलेश ने कहा कि जब तक अमर सिंह पार्टी में हैं, समझौता नहीं होगा.

– मुलायम सिंह ने कहा कि अमर सिंह उन के भाई जैसे हैं, वे पार्टी में रहेंगे.

– अखिलेश ने शिवपाल यादव को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया.

– जवाब में शिवपाल ने अखिलेश का समर्थन कर रहे प्रोफैसर रामगोपाल यादव को बाहर कर दिया.

– अखिलेश ने शिवपाल और अमर सिंह पर फर्जी खबर छपवा कर उन को ‘औरंगजेब’ कह कर बदनाम करने का आरोप लगाया.

– नाराज शिवपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को झूठा कहा और अपना सरकारी आवास खाली कर दिया.

अमर सिंह से नाराजगी क्यों

अमर सिंह के साथ अखिलेश यादव की तल्खी का राज मुलायम सिंह के घर में ही छिपा है. अखिलेश यादव का कहना है कि अमर सिंह परिवार में साजिश रच कर उन की सरकार को गिराना चाहते हैं.

अमर सिंह मुलायम सिंह यादव के साथसाथ शिवपाल यादव और मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के साथ खड़े हो जाते हैं. अमर सिंह के दोबारा पार्टी में आने के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हुई. ऐसे में इस का जिम्मेदार अमर सिंह को ही माना जा रहा है.

अखिलेश यादव यह तो कहते हैं कि बाहरी लोग झगड़ा करा रहे हैं, पर झगड़ा कौन करा रहा है, इस पर चुप हो जाते हैं.

शिवपाल यादव 2012 में ही खुद को मुख्यमंत्री की रेस से बाहर मान चुके थे. वे अखिलेश के अधीन सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे. ऐसे में शिवपाल यादव मुख्यमंत्री पद के लिए झगड़ा नहीं कर सकते. 

मुलायम सिंह यादव खुद ही मुख्यमंत्री की कुरसी छोड़ चुके हैं, ऐसे में वे भी मुख्यमंत्री की रेस में नहीं हैं. विवाद की वजह क्या है, यह बात अखिलेश यादव नहीं बता रहे हैं.

तब यह बात सामने आती है कि विवाद की वजह मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता और उन का परिवार है. अखिलेश यादव इस बात को सामने नहीं लाना चाहते. ऐसे में वे बारबार अमर सिंह का नाम सामने ला कर मसले को हल करना चाहते हैं. अखिलेश यादव के करीबी लोगों ने अमर सिंह का पुतला फूंकते हुए आरोप लगाए हैं कि अमर सिंह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के इशारे पर सपा में विवाद करा कर पार्टी को कमजोर करना चाहते हैं. शिवपाल गुट भी यही आरोप रामगोपाल यादव पर लगाता है कि भाजपा की मिलीभगत से वे पार्टी को तोड़ना चाहते हैं.