दरअसल में सक्रियता क्या होती है यह अब मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर भाजपा संगठन और सरकार को दिखा रहे हैं, जिन्हें मंत्री मण्डल के हालिया फेरबदल में उम्र का हवाला देकर मंत्री पद से चलता कर दिया गया था. तब तो इस एकाएक ही हुये इस हमले के माने न समझते हुये पार्टी की साख रखने गौर ने बेमन से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन अपनी बात रखने से चूके नहीं थे कि आखिर उम्र का सक्रियता से संबंध क्या मैं फिट हूँ और बेहतर तरीके से काम कर रहा हूँ, कमोबेश यही बात उनके साथ निकाले गए वरिष्ठ मंत्री सरताज सिंह ने भी मय दलीलों के कही थी लेकिन कोई सुनवाई आलाकमान ने नहीं की थी.

अब बाबूलाल गौर को समझ आ रहा है कि यह कोई नियम नहीं था, बल्कि सीएम शिवराज सिंह की इच्छा थी. इस बेइज्जती से तिलमिलाए गौर ने एक सधे और तजुर्बेकार नेता की तरह अक्ल से काम लिया और गुस्से में पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि अब एक आम विधायक की तरह विधानसभा में बैठकर सरकार की चिंदियां तो उड़ा ही रहे हैं, साथ ही  दूसरे उपेक्षित बूढ़े नेताओं से पींगे बढ़ाकर भाजपा वेटर्न पार्टी भी अघोषित तौर पर बनाने में जुट गए हैं, जिसका मकसद शिवराज सिंह की जितनी हो सके सरदरदियां बढ़ाना है, फिर चाहे तो पार्टी उन्हे पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर पूरी तरह बाहर कर दे इसकी परवाह उन्हें नहीं.

एक सामाजिक कार्यक्रम में शिरकत करने वे विदिशा गए तो पूर्व वित्त मंत्री राघव जी भाई के घर खासतौर से मिलने गए, जिन्हें अपने नौकर राजकुमार के कथित यौन शोषण के आरोप के चलते बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, तब से भाजपा में राघव जी की हालत अछूतों सरीखी हो गई थी. गौर के उनके घर जाने से सूबे में यह चर्चा बड़े दिलचस्प तरीके से हो रही है कि ये बुजुर्ग अब भस्मासुर बनने वाले हैं, इन्हे रोकने अब कौन सा नया नियम लाया जाएगा यह शिवराज सिंह और भाजपा आलाकमान के लिए एक चुनौती वाली बात है.

इस का एहसास उस वक्त विधानसभा में हुआ जब गौर ने सरकार को घेरते कई मुद्दों पर कटघरे में खड़ा कर दिया. एक तेज तर्रार मंत्री माया सिंह को तो उन्होने लताड़ लगा दी कि आपके जबाब पर मुझे तरस आ रहा है. अपने प्रशासनिक अनुभव का इस्तेमाल करते उन्होने कहा कि प्रदेश की वित्तीय हालत खस्ता है, उस पर 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है, उसका कुल बजट 1 लाख 58 हजार करोड़ रुपये का है, ऐसे में 15 करोड़ की नई गाडियां खरीदना कौन सी बुद्धिमानी की बात है. सस्ती गाडियां भी तो खरीदी जा सकती थीं, ऐसी फिजूलखर्ची के कई उदाहरण विस्तार से देते वे यह बताने में कामयाब रहे कि सरकार पैसा फूँक रही है खर्च नहीं कर रही.

गौर आरोप लगा रहे हैं या सुझाव दे रहे हैं यह तो वही जानें लेकिन उन्हे भाजपा के शिवराज पीड़ितों का प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष समर्थन मिल रहा है. उधर कांग्रेसी भी खुश हैं कि चलो सरकार की बखिया उधेड़ने एक मजबूत सहारा और साथ तो मिला. अब प्रदेश की राजनीति का आकर्षण बनते जा रहे ये बूढ़े और कौन से नए गुल खिलाएँगे इसकी चर्चा पूरी शिद्दत और दिलचस्पी से सूबे में है.