2002 में सीरियल ‘‘क्यों होता है प्यार’’ से अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले अमित साध ने अब तक चंद सीरियलों के अलावा ‘काई पो चे’, ‘गुड्ड रंगीला’, ‘सुल्तान’ सहित कुछ फिल्मों में अभिनय कर अपनी अलग छाप छोड़ी है. अब वह तीन फरवरी को प्रदर्शित होने वाली अपनी नई फिल्म ‘‘रनिंग शादी डाट काम’’ को लेकर काफी उत्साहित हैं, जिसमें उनकी जोड़ी फिल्म ‘‘पिंक’’ फेम अदाकारा तापसी पन्नू के संग है. मगर बौलीवुड के सभी कलाकारों के मुकाबले वह कुछ अलग तरह के इंसान व कलाकार हैं. उन्हे एंडवेचर बहुत पसंद है. वह सायकल बाइक पर काफी यात्राएं करते रहते हैं. 2019 में माउंट एवरेस्ट फतह करने की योजना बना रहे अमित साध ने अपनी अब तक की यात्राओं, अपने एडवेंचर, अपनी भविष्य की योजनाओं आदि को लेकर ‘‘सरिता’’ पत्रिका से खास बात की.

बौलीवुड में अक्सर आपके गायब हो जाने की चर्चाएं होती रहती हैं?

– मैं गायब नही होता. मैं एंडवेचरस इंसान हूं. हर फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद मैं बाइक पर घूमने निकल जाता हूं. मुझे हिमालय बहुत पसंद है. मैंने लद्दाख 6 बार बाइक पर घूमा हूं. मैंने कारगिल, ग्रास, मेन लद्दाख की 6 बार बाइक पर यात्रा की है. अभी मैं मनाली की यात्रा साइकल पर करने वाला हूं, जब बर्फ पिघल जाएगी. मतलब जून जुलाई में. पिनारी कलेशर चढ़ा हूं. 2019 में माउंट एवरेस्ट चढ़ने की योजना पर काम कर रहा हूं. मुझे एडवेंचर बहुत पसंद है. इसलिए भी मैं खुश रहता हूं. फिल्मों की शूटिंग करके मैं एडवेंचर्स काम करने निकल जाता हूं. लोगों को लगता है कि मैं नाराज हूं. मैं गुस्सैल हूं. मेरे पास काम नहीं है. मैं कही गायब हो गया हूं. वगैरह वगैरह. तो मैंने कहा कि एक ही चीज को देखने का नजरिया हर किसी का अलग होता है.

बाइक पर यात्रा करने के दौरान के आपके अनुभव क्या रहे? आप इस यात्रा के दौरान लोगों से मिलते होंगे. तो क्या बात हुई?

– इन यात्राओं के दौरान मैं जिन जमीन से जुडे़ हुए लोगों से मिला. उन्होंने मुझे भी जड़ों से जोड़ कर रखा. इसलिए मेरा एक ब्ल्यू प्रिंट बन चुका है कि मुझे क्या करना है. हकीकत यह है कि फिल्मों में कलाकार को बिगाड़ा जाता है, यहां कोई कलाकार के लिए खाना ले आता है. तो कोई पीने का कोई सामान ले आता है. इतनी सुविधाएं कलाकार को मिल जाती हैं कि वह बिगड़ जाता है. पर जब आप आम लोगों के बीच बैठते हैं, तो वह आपको आपकी जड़ों से जुड़े रहने पर विवश करते हैं. इसलिए फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद मैं एक आम इंसान बनकर इन आम लोगों के पास पहुंच जाता हूं. मुझे 14 से 15 हजार फुट उंचाई पर बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ आठ दस लोगों के साथ जमीन पर बैठकर कढ़ी चावल खाते हुए मजा आता है. मुझे पहाड़ों में टेंट में सोने में आनंद की अनुभूति होती है. यह सारी चीजें मुझे लोगों के साथ साथ कुदरत से जोड़ कर रखती हैं. जिस दिन आपका लगाव, आपका जुड़ाव कुदरत से खत्म हो जाता है. उस दिन आप भले ही दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत बन जाए, पर आपकी जिंदगी खत्म हो जाती है.

भविष्य में भी कुछ खास करने की योजना है?

– जी हां! सितंबर माह में मुंबई से एनएच 10 पकड़ कर पंजाब, जे के होते हुए लेह, खंडूरा 18500 फुट पर जाउंगा. फिर नीचे होते हुए लखीमपुर खीरी जाउंगा. वहां से काठमांडू जाउंगा. वहां से सिलीगुड़ी. सिलीगुड़ी से भूटान जाउंगा. भूटान जाने के लिए हमने इजाजत मांगी है. वहां से आसाम होते हुए नागालैंड में अपनी बाइक यात्रा खत्म करूंगा.

इस रूट को चुनने की वजह क्या है?

– पहाड़ मुझे हमेशा बुलाते रहते हैं. मुझे पहाड़ों पर जाकर बहुत सकून मिलता है  और मैंने जो यह रूट चुना है, इसमें संघर्ष बहुत ज्यादा है. आसान यात्रा करने में कुछ नहीं है. इस रूट पर पहाड़ चढ़ने हैं, टूटे फूटे रास्ते हैं. यह यात्रा मैं 550 सीसी बुलेट पर करूंगा. यदि किसी ने स्पांसर कर दिया, तो ट्रैम्प पर करूंगा. मेरे लिए अच्छी बात यह है कि पहले यह सब करने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते थे. अब मुझे यह सब मुफ्त में करने का मौका मिल रहा है. 

पर इस तरह के रूट बनाने के पीछे सोच क्या हैं?

– सोच कुछ नहीं. वजह यह है कि मुझे 2 अच्छे लोगों का साथ मिल गया है. यह जमीन से जुड़े लड़के हैं. बहुत विनम्र हैं. इसमें से एक हैं दीपक जो कि सायकल चैंपियन हैं. यह पीछे वाले पहिए पर 40 किलोमीटर साइकल चलाते हैं. हवा में साइकल उड़ा देते हैं. दूसरा लड़का है गैरी दत्त. इन दोनों से मेरा मेलमिलाप बहुत ज्यादा है. हम लोग साइकल के जरिए आपस में बहुत मिलते हैं. जब हम लोगों ने बैठकर विचार विमर्श किया कि कहां जाना है, तो किसी ने आसाम कहा, मैंने काठमांडू कहा. मैं काठमांडू जाना चाहता था. क्योंकि मैंने काठमांडू में फिल्म ‘यारा’ की शूटिंग की है. वहां पर भूकप आ चुका है. वहां पर जो हैरिटेज साइट है, वहां पर हमने गाना फिल्माया था. तो मैंने कहा कि जब हम लोग इस यात्रा पर जा रहे हैं, तो काठमांडू के उस हैरिटेज क्षेत्र की भूकंप आने के बाद क्या स्थिति है, देखने जाना चाहूंगा. इसके अलावा इस बार हम लोग इस पूरी यात्रा को फिल्मा रहे है. हमारी पूरी टीम जा रही है. दस कैमरा हैं. यह बहुत बड़े पैमाने पर हम कर रहे हैं.

इस एडवेंचरस यात्रा को फिल्माने की क्या वजह है?

– हम हमारी इस यात्रा को फिल्माकर दुनिया को भी दिखाना चाहते हैं. दुनिया को बताना चाहते हैं कि हमारा देश क्या है. हम लोग रास्ते में गांव में रूकेंगे. वहां के लोगों से बातचीत करेंगे. हमारी योजना यह है कि यदि किसी गांव में बीस बाइस साल की युवा लड़की मिली और उसने कहा कि उसे बाइक चलानी आती है, पर उसे बाइक चलाने का मौका नही मिलता है. तो हम उसे अपनी बाइक देंगे और अपने साथ चलने के लिए कहेंगे. पूरे 40 दिन की हमारी यह यात्रा है. हम लोगों ने दिमाग में कई योजनाएं बना रखी है.

अब तक आप जो यात्राएं कर चुके हैं, उन यात्राओं ने देष के किस गांव ने आपको प्रभावित किया?

– हमारा देश तो गांव का देश है. पर मैंने बेहतरीन गांव पाया मुक्तेश्वर में. नैनीताल से 5 किलोमीटर की दूरी पर मुक्तेश्वर है. वहां बहुत कम लोग जाते हैं. क्योंकि नजदीक में कोई एयरपोर्ट नहीं है. साधन उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए लोग कम जाते हैं. यदि मुक्तेश्वर के आस पास एअरपोर्ट होता, तो दिल्ली वाले जरूर पहुंचते . दिल्ली से मुक्तेश्वर 12 घंटे चाहिए, इसलिए लोग नहीं जाते. वहां पर एक जगह है, सरगा खेत. मैंने सरगा खेत में कैम्प किया था. मुझे यह जगह इतनी पसंद आयी थी, कि मैं कई माह रहा. मैंने वहां पर नौकरी भी की है. इस गांव से मेरा लगाव हो गया. हर वर्ष मौका मिलते ही चार पांच दिन के लिए इस गांव जाता रहता हूं. अभी 2015 मे फिल्म ‘सुल्तान’ की शूटिंग दिल्ली में कर रहा था, चार दिन की छुट्टी थी, तो मैं सरगा खेत चला गया था. एक जगह है-पीपला.  वहां एक एनजीओ काम कर रहा है – चिराग (सेंट्रल हिमालयन रूरल एक्शन ग्रुप). इसने पहाड़ों पर बहुत अच्छा काम किया है.इ नके साथ मिलकर हमने भी कुछ दिन काम किया. तो बहुत अमैजिंग अनुभव हैं. उनके जीवन की सरलता मुझे उन तक खींचती है. बिना किसी कारण मोहब्बत करने की उनकी जो क्षमता है, वह मुझे उन तक खींचकर ले जाती है.