बॉलीवुड में अक्सर निर्देशकों की शिकायत होती है कि उन्हें निर्माता के असहनीय दबाव में काम करना पड़ता है. और यदि फिल्म का निर्माता चर्चित निर्देशक हो तो बेचारा निर्देशक  कुछ ज्यादा ही असहाय सा हो जाता है.‘तनु वेड्स मनु’, ‘रांझणा’’ और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ जैसी सफलतम फिल्मों के निर्देशक आनंद एल राय की गिनती एक बेहतरीन रचनात्मक व सुलझे हुए इंसान के रूप में की जाती है. इन दिनों वह बतौर निर्माता व क्रिएटिव डायरेक्टर फिल्म ‘मनमर्जियां’ का निर्माण कर रहे हैं. जिसका निर्देशन समीर शर्मा कर रहे हैं.

इस फिल्म में आयुष्मान खुराना के साथ भूमि पेडणेकर की जोड़ी है. ऐसे में सवाल उठता है कि उनकी तरफ से सामने वाले निर्देशक पर कितना दबाव होता है? और जब यही सवाल हमने आनंद एल राय से किया, तो आनंद एल राय ने कहा-‘‘जैसा कि मैंने अभी कहा कि निर्देशक के तौर पर मैं कभी किसी का दबाव सहन नहीं करता. उसी तरह निर्माता के तौर पर मैं किसी भी निर्देशक पर दबाव नहीं बनाता. मैं यहां पर एक ऐसा प्लेटफार्म तैयार करना चाहता हूं, जहां एक निर्देशक का अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस हो और निर्देशक बिना दबाव के काम करते रहें. हमारे यहां कोई तनाशाही नही है. मेरी सोच यह है कि हम आपस में बैठकर चाय पीते हुए किसी सही व सटीक हल पर पहुंच जाएंगे. मेरा सपना है कि निर्देशक के तौर पर आप अपनी पसंद की फिल्में बनाएं.’’

यानी कि आनंद एल राय का दावा है कि उनकी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी ‘‘एलो कलर्स प्रोडक्शन’’ में तानाशाही वाला रवैया नही है. मगर फिल्म ‘मनमर्जियां’ को लेकर कई तरह की खबरें फैली हुई हैं. चर्चा है कि फिल्म का पहला शिड्यूल खत्म होने के बाद आंनद एल राय के कहने पर इसे रीशूट किया गया. पर फिल्म जिस तरह से बनी है, उससे आनंद एल राय संतुष्ट नहीं हैं. इसलिए उन्होंने ‘मनमर्जिया’ के निर्देशक समीर शर्मा को हटा दिया है.

जब हमने यह बात आनंद एल राय के समक्ष रखी, तो आनंद एल राय ने बड़े शांत स्वभाव व विनम्रता के साथ कहा-‘‘आपने बहुत सटीक सवाल किया है. मैं पूरी घटना बता देता हूं. इस फिल्म का निर्देशन समीर शर्मा कर रहे थे, जो कि मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे. वह आज भी मेरे अच्छे दोस्त हैं. मैं आज भी उन्हें एक अच्छा निर्देशक मानता हूं. वह मेरे पास एक कथा लेकर आए. तो मुझे लगा कि इस पर फिल्म बननी चाहिए. सब कुछ तय हो गया. कलाकार भी तय हो गए. जब फिल्म का पहला शिड्यूल पूरा हुआ, तो मुझे अहसास हुआ कि फिल्म जिस तरह से बननी चाहिए थी, उस तरह से नहीं बनी है.”

वे आगे कहते हैं कि, “हमने इस मसले पर आपस में बैठकर बातचीत की. उसके बाद फिर दो चार दिन शूटिंग हुई. पर हमें अहसास हुआ कि बात बन नहीं रही है. कई बार ऐसा होता है कि कहानी, निर्देशक, कलाकार सभी बहुत अच्छे होते हैं, पर कहीं न कहीं लगता है कि कहानी सिमट नहीं रही है. मतलब सब कुछ सही होते हुए भी जो ‘सुर’ मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है.‘मनमर्जियां’ के साथ भी वही स्थिति बनी हुई है. मैंने सोचा कि इस फिल्म के साथ जुड़े सभी लोग अच्छे हैं. कहानी भी अच्छी है. पर यह फिल्म जिस ढंग से बन रही है, वैसे बन गयी, तो यह, वह फिल्म नहीं होगी, जो हम बनाना चाहते हैं. अतः हम लोगों ने शूटिंग रोक कर इस स्थिति पर विचार विमर्श करने के लिए समय लिया. एक दिन समीर शर्मा ने मुझसे कहा कि अब इस फिल्म को आगे मैं अपने हिसाब से निर्देशित करूं. और वह दूसरी फिल्म पर काम करना चाहते हैं. समीर शर्मा आपसी सहमति से खुद को इस फिल्म से अलग कर दूसरी फिल्म पर काम करने जा रहे हैं. यह सारा निर्णय दो रचनात्मक लोगों की आपसी बातचीत का रहा. कहीं कोई विवाद या तानाशाही का मसला नही है.’’

तो इस अनुभव के साथ यह बात उभरती है कि क्या हर कहानी हर निर्देशक के लिए उपयुक्त नहीं होती है? इस सवाल पर आंनद एल राय ने कहा-‘‘बिल्कुल यही बात सामने आती है. कई बार ऐसा हुआ है कि मैं कहानी सुनता हूं, मुझे कहानी बहुत पसंद आती है. पर मुझे खुद लगता है कि इस कहानी पर काम नहीं कर पाउंगा. पर मैं उस फिल्म को देखना जरूर चाहूंगा. मैंने फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ देखी और बहुत इंज्वॉय किया. पर यदि यह फिल्म मुझे बनाने को दी जाती, तो इस अंदाज में न बना पाता, जिस अंदाज में संजय लीला भंसाली ने बनायी है. मैं यदि इसे बनाता तो वह किस तरह की फिल्म बनती कह नहीं सकता. कई बार हमने देखा है कि बहुत अच्छी पटकथा पर बनी फिल्म भी अच्छी बनकर नहीं निकलती है. तो हमें सतर्क रहने की जरूरत है. मेरी राय में फिल्म सफल या असफल नहीं होती. बल्कि फिल्म एक इंसान के वीजन से निकलनी चाहिए. फिल्म किसी भी एक इंसान के वीजन से ना निकली हो, तो वह तकलीफ ही देती है.’’