यह सुन कर चौंकिएगा नहीं कि गुजरात के शैलेश अपने ही पोते के जैविक पिता हैं. यह इस तरह संभव हुआ कि शैलेश के पुत्र राहुल पटेल, जोकि अमेरिका में सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं, को अजूस्पर्किया नामक बीमारी हो गई. इस की वजह से राहुल में स्पर्म बनना बंद हो गया. ऐसी स्थिति में परिवार की कड़ी आगे किस तरह बढ़े, यह विचारणीय प्रश्न बन गया. परिवार ने मिल कर तय किया कि अन्य के स्पर्म लेने के बजाय राहुल के पिता शैलेश के ही स्पर्म ले लिए जाएं ताकि बच्चा जैनेटिकली अंतर्परिवारीय हो. ऐसा ही किया गया और आयु के 60वें दशक में प्रवेश कर चुके शैलेश इस तरह अपने पोते के जैविक पिता बन गए.
 
‘विकी डोनर’ फिल्म की तर्ज पर एक ब्रिटिश पुरुष ने स्पर्म डोनेशन करना शुरू कर दिया. जब उस की पत्नी को इस बात का ज्ञान हुआ तो वह कुपित हो गई. उस ने ह्यूमन फर्टिलाइजेशन ऐंड एंब्रयोलौजी अथौरिटी यानी एचएफइए से पति द्वारा किए जा रहे स्पर्म डोनेशन को गैर कानूनी बताते हुए मांग की कि पति के स्पर्म को पत्नी की ‘वैवाहिक संपत्ति’ माना जाए.
 
ब्रिटिश अखबार ‘डेली मेल’ के अनुसार, इस महिला ने शंका व्यक्त की है कि इन स्पर्म से उत्पन्न बच्चे से मेरे पति का नैसर्गिक रूप से इमोशनल अटैचमैंट बनेगा. परिणाम- स्वरूप भविष्य में वह मेरे बेटे के सौतेले भाईबहन के रूप में जुड़ कर परेशानियों का सबब बन सकता है क्योंकि बालिग होने पर उस बच्चे को जैविक पिता के बारे में जानने का कानूनी अधिकार है. महिला ने एचएफईए से इस संबंध में आवश्यक गाइडलाइन बनाने की भी मांग की है.
 
गौरतलब है कि वर्ष 2005 में ब्रिटेन के एक कोर्ट ने आदेश दिया था कि एक स्पर्म डोनर सिर्फ 10 परिवारों को ही स्पर्म डोनेट कर सकता है. इतना ही नहीं, यदि स्पर्म डोनेशन से उत्पन्न बच्चा बालिग होने पर बायलौजिकल पिता के बारे में जानना चाहे तो उसे उस के बारे में जानकारी देनी होगी. बच्चा चाहे तो क्लिनिकल प्रमाण के साथ जैविक पिता से मिल व जुड़ भी सकता है किंतु जैविक पिता को अपनी ओर से उस से मिलने व जुड़ने का अधिकार नहीं होगा. क्योंकि डोनेशन से पूर्व स्पर्म डोनर से इस आशय का शपथपत्र लिया जाता है कि उसे यह जानने का अधिकार नहीं होगा कि स्पर्म का प्रयोग कहां किया गया है और न ही वह भविष्य में बच्चे पर अपना अधिकार जताएगा.
 
जहां तक हमारे देश की बात है, संसद में वर्ष 2008 में एक विधेयक लाया गया था. कृत्रिम रूप से बच्चे पैदा करने की तकनीक से जुड़ा यह विधेयक आज तक संसद में पारित नहीं हो पाया. इस विधेयक में इस क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए कुछ कानून सुझाए गए थे. प्रजनन केंद्रों के डाक्टर भी इस के लिए देश में नियंत्रक कानून बनाए जाने की मांग कर रहे हैं जिस से स्पर्म डोनेशन के साथ आईवीएफ तकनीक पर ध्यान रखा जा सके. उन की मांग थी कि स्पर्म डोनेट करने वाले लोगों की सूची रखे जाने के लिए एक केंद्रीय संस्थान का गठन किया जाए ताकि भारत सरकार के कानून के अंतर्गत सांविधिक रूप से इस पर नियंत्रण रखा जा सके.
 
बावजूद इस के, हमारे देश में भी यह कारोबार अपने पांव पसार रहा है. स्पर्म लेनदेन के विशिष्ट नियमकायदे तो नहीं हैं पर स्वयं निर्मित संहिता का पालन अवश्य किया जाता है. वात्सल्य प्रजनन केंद्र के क्लिनिकल रिसर्च विभाग की डा. वसुधा भट्ट कहती हैं, ‘‘ब्लड डोनेशन की भांति स्पर्म डोनेशन भी समाज हित का कार्य है, इसलिए इस के बदले पैसा दिए जाने का प्रावधान नहीं है. मगर स्पर्म डोनेशन की बात कुछ और ही है. यहां स्पर्म लेने वाले की चाह के अनुसार विशिष्ट, योग्य व्यक्ति का चयन और निश्चित मानदंडों के अनुसार उस का क्लिनिकली स्वस्थ होना अहम चुनौती है. ऐसे दुर्लभ चयन व गोपनीयता की शर्त के कारण केंद्र को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से मनचाहे धन का प्रलोभन देना पड़ता है ताकि डोनर स्वेच्छा व उमंग से स्पर्म डोनेट कर सके. तत्पश्चात डोनर से प्राप्त स्पर्म को ‘-196 डिगरी सेल्सियस’ पर लिक्विड नाइट्रोजन में स्टोर कर संरक्षित रखना होता है.’’
 
मगर मौडर्न आईवीएफ सैंटर की डा. कंचन जाघव बताती हैं कि भारत में स्पर्म देने और लेने वालों का आज भी टोटा है. हमारे देश में स्पर्म डोनेशन के लिए स्वस्थ, सुयोग्य व्यक्ति के चुनाव हेतु कोई मानदंड तय नहीं है. सामान्यतया प्रजनन केंद्र यही ध्यान रखते हैं कि प्राप्त किया जाने वाला स्पर्म रोगदोष मुक्त हो. जैविक रूप से स्पर्म डोनर कितना युवा, सुयोग्य और प्रतिभाशाली है, इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता.
 
हालांकि फिर भी तमाम वर्जनाओं व नकारात्मकताओं के बावजूद युवावर्ग में स्पर्म देने व लेने के प्रति रु?ान बनने लगा है. चूंकि अब संयुक्त परिवार तो रहे नहीं और न ही उन का पहले जैसा भावनात्मक दबदबा रहा है, ऐसी हालत में एकल परिवार अंत:परिवारीय घालमेल में पड़ कर, खामखां विचित्र स्थितियों से रूबरू होना नहीं चाहते, क्योंकि अंत:परिवारीय स्पर्म लेनदेन के कारण संभव है कि पारिवारिक संबंध नष्टभ्रष्ट व विकृत हो जाएं. कोई बड़ी बात नहीं कि इन के कारण ब्लैकमेलिंग का ऐसा तानाबाना बुना जाए कि परिवार अनैतिक संबंधों की दलदल बन कर रह जाएं. कौन जाने, इस तरह उत्पन्न संतान को शैलेश व राहुल के उदाहरण की भांति जीवनपर्यंत कलंकित, विषम संबोधनों व आरोपों से मुखातिब होना पड़े और नतीजतन पारिवारिक संबंधों का तानाबाना बिखर जाए. इसलिए ऐसी विषम परिस्थितियों से बचने के उद्देश्य से एकल परिवार गोपनीयता बरतते हुए स्पर्मबैंक से ही स्पर्म प्राप्त करने का सुरक्षित मार्ग अपनाने लगे हैं.
 
इस के बावजूद स्पर्म डोनेशन के कारण उत्पन्न होने वाली कतिपय पारिवारिक व सामाजिक समस्याओं से इनकार नहीं किया जा सकता. उदाहरण के लिए स्पर्म डोनेशन से उत्पन्न बच्चों में स्वाभाविक रूप से नैसर्गिक पैतृक गुणावगुण का अभाव दृष्टिगत होगा और संभव है उन के कारण मातापिता के अपनत्व भाव में नीरसता आ जाए. अति तो उस समय हो जाएगी, जब मातापिता व बच्चे के संबंधों में तनिक मात्र का विचलन आ जाने पर विभिन्न आक्षेपों का सिलसिला प्रारंभ हो जाएगा. असंभव नहीं कि इस कारण परिवार के अन्य सदस्य भी ऐसे बच्चों को बाहरी अंश मान कर अलगाव भाव बरतने लगें.
 
श्रीमती दुर्गादेवी मैमोरियल हौस्पिटल की डा. ललिता खंडेलवाल इस की पुष्टि तो नहीं करतीं मगर कहती हैं कि सच तो यह है कि हमारे यहां स्पर्म डोनेशन आज भी अनजाना सा नाम है और जो जानते हैं उन के लिए तो यह वर्जनापूर्ण विषय है. फिर भी इस पर हो रही चर्चाओं से, चाहे वे फिल्म के कारण शुरू हुई हों या मीडिया के माध्यम से, लोगों की जिज्ञासाएं अवश्य बढ़ी हैं किंतु स्पर्म डोनेट करने या डोनेटेड स्पर्म ग्रहण करने के मामले में लोगों की दकियानूसी ?ि?ाक आज भी देखने को मिलती है. जहां अन्य के शुक्राणु ले कर संतानोत्पत्ति की बात है, वहां भारतीय पारंपरिक समाज में परपुरुष के शुक्राणु से उत्पन्न संतान को वर्णसंकर मान कर हेय दृष्टि से देखा जाता है. इस बात का सबूत प्रथम उदाहरण है, जो होने को तो पढ़ेलिखे, खुले विचारों वाले भारतीय परिवार से संबंधित है पर उन्होंने शुक्राणु लेने के मामले में दकियानूसी सोच दिखाई और बाहरी स्वस्थ युवा व्यक्ति के स्पर्म लेने के बजाय स्वयं के परिवार के प्रौढ़ायु व्यक्ति के स्पर्म लेना उचित माना.
 
ऐसी संभावनाएं भी बनती हैं जब मातापिता बच्चों में उच्च या विशेषीकृत जैनेटिक गुणों की चाह में, बच्चा पैदा करने के योग्य होने के बावजूद, व्यक्ति विशेष के स्पर्म की मांग करने लगें. सुनने में आया है कि ‘विकी डोनर’ फिल्म के बाद जौन अब्राहम के स्पर्म की मांग होने लगी थी तब अब्राहम को उपहास में कहना पड़ा कि यदि ऐसा हो गया तो मैं ‘फादर औफ नैशन’ बन जाऊंगा. कल को कोई क्रिकेटर की चाह में सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धौनी या अन्य की या विशिष्ट पारंगतता प्राप्त विभूतियों के स्पर्म की चाह रखने लगे तो हैरानी नहीं.
 
कल्पना कीजिए, ऐसा हुआ तो एक व्यक्ति के अनेक क्लोन नजर आने लगेंगे जिस से उस व्यक्ति की विशिष्टता ही समाप्त हो जाएगी. सोचने वाली बात है, यदि क्रिकेट टीम में एक सचिन की जगह सभी सचिन हों, तो फिर सचिन की महत्ता कहां रह जाएगी?
 
जो कुछ भी हो, इन्हें नियंत्रित करने के लिए भारत सरकार को वर्ष 2008 में प्रस्तुत विधेयक को अद्यतन कर, अविलंब प्रभावी दिशानिर्देश पारित करने होंगे. कानून में स्वस्थ व सक्रिय स्पर्म की सुनिश्चितता के साथ यह व्यवस्था भी करनी होगी कि जैविक पिता और उत्पन्न संतान के संबंधों की गोपनीयता पूरी तरह से बनाई रखी जाए, अन्यथा मां व बच्चे के अतिरिक्त दोनों परिवार (शुक्राणु प्रदाता व गृहीत्वा) प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे. दूसरी ओर गोपनीयता भंग हो जाने की स्थिति में ‘नारायण दत्त तिवारी प्रकरण’ की भांति कोई बच्चा व उस की मां डीएनए टैस्ट के आधार पर पितृत्व की नई समस्याओं को जन्म दे सकती है. अत: उभयपरीक्षा सुरक्षा सुनिश्चित किए जाने के लिए एक परिपूर्ण निरापद कानून की सख्त आवश्यकता है.
 
समय रहते ऐसा नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब स्पर्म डोनेशन के प्रचलन में आते ही ब्रिटेन और अरब अमीरात की भांति भारत में भी विभिन्न समस्याएं जन्म लेने लगेंगी. देश में ‘मैडिकल टूरिज्म’ की बढ़ती संभावनाओं के कारण विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रस्तुत होने की भी प्रचुर संभावनाएं हैं. इसलिए एक समग्र कानून बनाए जाने की जरूरत है ताकि ब्लड डोनेशन की भांति स्पर्म डोनेशन भी सकारात्मक रूप से अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके.