सरिता विशेष

वित्त वर्ष 2013-14 की शुरुआत में बौंबे स्टौक ऐक्सचेंज यानी बीएसई ने निवेशकों को तगड़ा ?ाटका दिया है. यह रुख पिछले वित्त वर्ष के आखिरी दिन से देखने को मिल रहा था जब समाप्त वित्त वर्ष के अंतिम दिन बाजार 4 माह के निचले स्तर तक लुढ़क गया था. इस के पहले बाजार में खासी चहलपहल थी और सूचकांक लगातार 6 दिन तक तेजी पर बंद हुआ था.

नए वर्ष की शुरुआत हालांकि तेजी पर हुई लेकिन यह मामूली बढ़त थी. उस के बाद पूरे सप्ताह बाजार में निराशा का माहौल रहा. सप्ताह के दौरान सूचकांक 550 अंक तक लुढ़क गया. गुरुवार को बाजार 292 अंक गिर कर फिर 4 माह के निचले स्तर पर चला गया. फरवरी के बाद बाजार में यह सब से बड़ी गिरावट है. इस साल 28 जनवरी को बाजार 20 हजार अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया था लेकिन उस के बाद सूचकांक इस स्तर पर नहीं पहुंच सका.

बाजार मेें बिकवाली का भारी दबाव है. इस की वजह वैश्विक बाजार में जारी गिरावट व देश में जारी राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है. केंद्र सरकार गठबंधन के बल पर चल रही है और उस के 2 बड़े सहयोगियों, तृणमूल कांग्रेस और द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम यानी द्रमुक के गठबंधन से बाहर होने पर समाजवादी पार्टी की बैसाखियों पर सरकार चल रही है. सपा बारबार सरकार को उस के पंगु होने का एहसास दिला रही है और जब भी सपा बैसाखियों को हिलाती है तो सरकार का सिंहासन डोलने लगता है. नतीजतन, बीएसई में भूचाल आने लगता है.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजनीतिक अस्थिरता अब इस सरकार का पीछा छोड़ने वाली नहीं है, इसलिए बाजार में मजबूती का रुख कम ही देखने को मिलेगा. इस के अलावा चीन में भी मंदी चल रही है. पश्चिम एशिया और कोरियाई द्वीप में तनाव का माहौल है. इन सब परिस्थितियों के बीच बाजार में अस्थिरता बने रहने की संभावना बढ़ गई है. निवेशक राजनीतिक अस्थिरता के कारण चिंतित है और वह मुनाफा वसूली पर ज्यादा ध्यान दे रहा है.