सरिता विशेष

वर्ष 2013 में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर हाल ही में एक अध्ययन आया है. इस अध्ययन में यह बताया गया है कि इस साल वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था में किस तरह की चुनौतियां होंगी और ये चुनौतियां किन क्षेत्रों से ज्यादा होंगी. वैश्विक अर्थव्यवस्था क्रम में भारत को भी जोखिम के रूप में देखा गया है. कहा गया है कि देश में अगले वर्ष आम चुनाव है, सो सरकार लोकप्रिय आर्थिक निर्णय लेगी और विपक्ष चाह कर भी लोकप्रिय निर्णयों का विरोध नहीं कर सकेगा. इस में क्षेत्रीय दल कमजोर स्थिति में होंगे और छोटे मुद्दे भी उन के सामने बड़ी चुनौती होंगे. कमजोर आर्थिक नीतियों को समर्थन मिलेगा तो उस से वित्तीय नीति पर असर पड़ेगा और कमजोर भारतीय वित्तीय नीति आखिरकार वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बनेगी.

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए इस अध्ययन में जोखिम के लिहाज से भारत 9वें स्थान पर है. इस क्रम में दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए सब से बड़ा जोखिम उभरते बाजारों में अस्थिरता का माहौल है. उभरते बाजार अचानक जमीन से आसमान और आसमान से जमीन पर उतर रहे हैं. दूसरा बड़ा जोखिम चीन से है. वह देश सूचनाओं के बढ़ते प्रवाह से परेशान है और सूचना का यह प्रवाह उस की खुद की अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरनाक है. वाशिंगटन की नीतियां और अरब देशों के जारी संघर्ष भी इस क्रम में महत्त्वपूर्ण बताए गए हैं.

यूरोपीय देशों की कुछ कमजोर कडि़यों को भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिहाज से चुनौतीपूर्ण माना गया है. पिछले वर्ष इन देशों को बचाने के लिए पूरे यूरोप में जद्दोजहद का दौर जारी रहा. पूर्वी एशिया में कुछ देशों, खासकर चीन और जापान, के बीच विवादित क्षेत्र को ले कर अकसर होने वाली तकरार को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है.

भारत से पहले 8वें स्थान का जोखिम ईरान को बताया गया है. ईरान पश्चिम देशों के लिए परमाणु कार्यक्रम की वजह से संकट बना हुआ है. ईरान कहता है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरत के लिए परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा दे रहा है जबकि पश्चिम देशों का कहना है कि वह परमाणु हथियार बना रहा है. दोनों पक्षों में यह तकरार घटी नहीं तो ईरान पर और आर्थिक प्रतिबंध लगेंगे जो वैश्विक कार्यव्यवस्था के विकास के लिए प्रतिकूल होगा.