सरिता विशेष

राहुल गांधी ने जीवन के 2 बड़े आकर्षणों को त्यागने की घोषणा की. उन्हें न सत्ता से प्यार है न स्त्री से. वे तो देशसेवा करेंगे. वे न प्रधानमंत्री बनेंगे न विवाह करेंगे. कारण चाहे उन्होंने कुछ भी बताए हों पर भावी प्रधानमंत्रियों में से एक का रेस से निकल जाना व्यक्तिपूजक देश के लिए थोड़ा चौंकाने वाला है क्योंकि यहां तो सब सोचे बैठे हैं कि जब तक गांधी परिवार है, देश की राजनीति उन के हाथों में है, चाहे वह सत्ता में हो या सत्ता से बाहर.

राहुल गांधी ने सत्ता में दिलचस्पी न दिखा कर वही किया है जो देश के लाखों संन्यासी करते हैं. कहने को वे मायामोह से दूर होते हैं पर भव्य मंदिरों और आश्रमों में रहते हैं, औरतों से घिरे रहते हैं, निजी हवाई जहाजों में चलते हैं, उन के साथ सेवकों का लावलश्कर होता है. राहुल गांधी की कांग्रेस बहुमत में हो या अल्पमत में, प्रधानमंत्री को उन की इच्छानुसार चलना ही होगा क्योंकि देशभर में कई राज्यों में कांग्रेसी सरकारें अवश्य होंगी और संसद में उन की उपस्थिति कम न होगी.

राहुल गांधी ने वैसे अब तक अपनी राजनीतिक विलक्षणता नहीं दिखाई है पर दुनिया के कितने ही देशों के शासक अब बौने साबित हो रहे हैं. चीन के नए राष्ट्रपति शी जिनपिंग कोई विशेष सोच नहीं रखते. इंगलैंड के डेविड कैमरून बस नेता हैं. जापान के प्रधानमंत्रियों के तो नाम भी याद रखना कठिन है क्योंकि साल में 1-2 तो बदल ही जाते हैं.

बराक हुसैन ओबामा (अमेरिका) या ब्लादिमीर पुतिन (रूस) या एंजिला मार्केल (जरमनी) जैसे अपनी सोच वाले शासक अब कम ही हैं. मनमोहन सिंह भी लुंजपुंज शासकों में गिने जाएंगे पर चूंकि उन की सोच पर सोनिया गांधी का दबदबा है, सोनिया को मौलिक विचारों का श्रेय दिया जा सकता है जिस का राहुल गांधी में पूरी तरह अभाव है.

राहुल गांधी का सत्ता या स्त्री के लिए ना करना देश की सेहत पर कोई असर न डालेगा. देश के राजनीतिक इतिहास में वैसे भी राहुल गांधी का असर आधी लाइन का होता नजर आ रहा है.