पेड़ जीवन के लिए आवश्यक हैं पर उन के कहीं भी उग आने पर उन्हें सदा के लिए राम, अंबेडकर की मूर्तियों या मजारों की तरह मान लेना और काटने पर हल्ला मचाना गलत है. दिल्ली के प्रगति मैदान में लगभग 1500 पेड़ 30-40 सालों से हैं पर अब पूरे इलाके को नए सिरे से बनाने के लिए उन्हें काटना जरूरी है, तो इस पर भरपूर हल्ला मचाया जा रहा है. इसी तरह दिल्ली की एक सड़क चौड़ी तो हो गई पर वहां दसियों पेड़ बीच में अडे़ हैं और लोग उन्हें बचाने की जिद कर रहे हैं.

घर के बाहर या आंगन में पेड़ लगाना हजारों सालों से परंपरा के रूप में चल रहा है पर जरूरत पड़ने पर अगर पेड़ के काटने पर रोक लग गई तो लोग नए पेड़ लगाने बंद कर देंगे. पेड़ तभी तक लगाए जाएंगे जब तक मानव के लिए सुख देंगे. यदि उन्हें आराध्य या प्रकृति के लिए अनिवार्य मान कर जबरन थोपा जाएगा तो लोग उन्हें लगाना ही छोड़ देंगे.

पीपल के पेड़ों को काटने पर धार्मिक रोक है और इसलिए लोग इन्हें कम से कम लगाते हैं और ये दिखते हैं तो केवल इसलिए कि ये अपनेआप कहीं भी उग जाते हैं. पेड़ों की रक्षा जरूरी है और नए पेड़ लगाने भी जरूरी हैं पर उन्हें आवश्यकता के अनुसार हटाने की सुविधा भी होनी चाहिए. पेड़ इतने जरूरी हैं कि चीन पूरा एक शहर ही इस तरह का बनवा रहा है जिस में हर मंजिल पर भी पेड़ लगाने का प्रबंध है और

30 हजार की आबादी लगेगी कि एक जंगल में रह रही है. यह तभी संभव है जब पेड़ों के बारे में हठधर्मी बंद हो.

देश में आज भी लकड़ी की कमी है और इसीलिए पेड़ गरीबों द्वारा खूब काटे जाते हैं पर उन पर तो यह प्रतिबंध भी लागू नहीं होता. वे रातोंरात पेड़ का सफाया कर देते हैं. स्लमों में पेड़ न के बराबर दिखेंगे, क्योंकि उन्हें काट कर खाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर लिया जाता है और फिर गरमियों में लोग भट्ठी में रहते हैं. यह समझ का अभाव है जिस के पौधे हरेक के मन में लगाने सड़कों या कालोनियों के पेड़ों को बचाने से ज्यादा जरूरी हैं.

पर्यावरण के नाम पर धार्मिक पोंगापंथी सा पैतरा अपना लेना मूर्खता है. यह पर्यावरण के लिए हानिकारक है. शहरों का विकास होगा तो पेड़ कटेंगे ही. हां, उन की जगह नए भी लगेंगे. कोई शहर, कालोनी या मकान अच्छा तभी लगता है जब पेड़ हों. आदमी पेड़ का दुश्मन तब बनता है जब बेवकूफ हो.