सरिता विशेष

जयपुर के आमेर किले को बड़े कौतूहल से निहारने के बाद मार्था जंतरमंतर के 2 चक्कर लगा चुकी थी. उसे सब कुछ अच्छा तो लगा था, लेकिन कालचक्र की गणना करने वाले यंत्रों में उस की कोई दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि उस के दूसरे साथी, पुछल्ले की तरह चिपके हुए गाइड की बातें बड़े गौर से सुन रहे थे. अलबत्ता अखरती धूप अब चुभने लगी थी, जिसे वे लोग हथेलियों से ढांपने की असफल कोशिश कर रहे थे.

मार्था ने उन्हें लौट चलने को कहा भी, लेकिन उन का ध्यान मार्था की तरफ नहीं था. नतीजतन वह गुस्से में पांव पटकती हुई जलेब चौक जाने वाले उस रास्ते की तरफ चली गई, जिस के दोनों ओर दूरदूर तक एंटीक की दुकानों की लंबी कतार थी. मार्था को उधर से गुजरते देख राजस्थानी पोशाक में फंसे हुए से दिखने वाले ‘लपका’ किस्म के लड़के, टूटीफूटी अंगरेजी में दुकानों की तरफ ध्यान बंटाने के लिए उस की तरफ दौड़े भी, लेकिन मार्था ने जब उन्हें आंखें तरेरते हुए उपेक्षित भाव से देखा तो वे वहीं थम गए.

मार्था लगभग एक हफ्ते पहले अपने साथियों के साथ आस्ट्रेलिया से यहां पहुंची थी. दिल्ली होते हुए पहले वे जयपुर आए थे. इस दौरान इस टोली ने जयपुर के तकरीबन सभी टूरिस्ट प्लेसेज देख लिए थे. मार्था की कल्पनाओं में जयपुर राजारानियों का शहर था. पिछले 3 दिनों में उस ने इतिहासकालीन वैभव को जी भर कर देखा. राजस्थानी पोशाक पर उस का मन इतना मचला कि जयपुर पहुंचने के बाद उस ने कई जोड़ी पोशाकें खरीद ली थीं और बदलबदल कर उन्हीं को पहन रही थी. उस समय भी उस ने कांचली और घाघरा पहन रखा था. पोनीटेल की तरह उस के बाल पीठ पीछे बंधे थे.

जलेब चौक का रास्ता आगे जा कर इतिहासकालीन इमारतों से घिरे एक बड़े से चौगान में खत्म होता था. उस ने पीछे मुड़ कर दूरदूर तक नजर दौड़ाई, लेकिन उस के साथी काफी पीछे छूट गए थे. उस ने टूटीफूटी अंगरेजी में राहगीरों से पूछताछ की तो पता चला कि आगे जा कर पोल सरीखा रास्ता गोविंददेवजी के मंदिर की तरफ मुड़ता है. वहां तक घंटेघडि़याल की आवाज भी सुनाई दे रही थी. उसी समय उसे कई लोग अपनी तरफ लपकते नजर आए. मार्था को होटल का रास्ता मालूम था, लेकिन होटल लौटने से पहले वह किसी ट्रैवल एजेंसी से पुष्कर के बारे में कुछ जानकारियां लेना चाहती थी.

त्रिपोलिया की तरफ लौटते हुए उसे थोड़ेथोड़े फासले पर ट्रैवल एजेंसियों के बोर्ड लटकते नजर आए. इस से पहले कि वह कुछ तय कर पाती, पास की ट्रैवल एजेंसी की दहलीज पर उसे एक खूबसूरत सा नौजवान खड़ा नजर आया. आसमानी सूट वाला वह युवक काफी स्मार्ट था. उस के गले में सोने की मोटी चेन लटक रही थी और हाथों में सोने का ब्रेसलेट था.

मार्था को असमंजस में एजेंसियों के बोर्ड की तरफ ताकते देख युवक की नजरें उस पर टिक गईं. उस ने बड़ी शालीनता से अंगरेजी में पूछा, ‘‘आप किस से मिलना चाहती हैं?’’

‘‘आई एम मार्था…मार्था जोंस फ्रौम आस्ट्रेलिया.’’ युवक की तरफ गौर से देखते हुए उस ने अपनी बात पूरी की, ‘‘दरअसल, मैं पुष्कर जाना चाहती हूं, इसी सिलसिले में किसी ट्रैवल एजेंट से मिलना चाहती थी.’’ मार्था उस युवक से काफी प्रभावित लगी.

‘‘लेकिन आप ने यहां आने का वक्त गलत चुना.’’ युवक ने अपना नाम नीरज बताते हुए बोर्ड पर लिखी इबारत की तरफ इशारा किया, जिस पर लिखा था, ‘‘मिलने का समय सुबह 8 बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम को 5 बजे से 9 बजे तक.’’

‘‘ओह!’’ अपनी रिस्टवाच की तरफ देखते हुए मार्था थोड़ी मायूस नजर आई. फिर सहज होते हुए बोली, ‘‘कोई बात नहीं, मैं फिर किसी वक्त मिल लूंगी.’’

‘‘आई कांट सी ए डेमसेल इन डिस्टै्रस (मैं किसी सुंदरी को मुश्किल में नहीं देख सकता). आप का इस तरह मायूस होना मुझे अच्छा नहीं लगा.’’ नीरज ने मार्था को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘आप हमारे शहर की मेहमान हैं. इस नाते आप की मदद करना मेरा फर्ज है.’’

‘‘लेकिन…’’ मार्था ने अचकचाते हुए कहा, ‘‘तो फिर बुकिंग अभी कैसे हो पाएगी?’’

‘‘हर समस्या का हल होता है, इस का भी है. आप सिर्फ डिटेल्स दे कर अपने होटल का नाम बता दीजिए और इत्मीनान से लौट जाइए…टिकट आप को आप के होटल में मिल जाएगा.’’

‘‘लेकिन इस के लिए डिपाजिट..?’’ मार्था ने अपना पर्स टटोलते हुए कहा, ‘‘मुझे कंपलीट पैकेज चाहिए. इस के लिए कितना अमाउंट देना होगा?’’

‘‘मैडम! मैं ने आप से कहा न कि आप इत्मीनान से होटल लौट जाइए. पैकेज अमाउंट की बात छोडि़ए. हिसाबकिताब बाद में होता रहेगा.’’ इस से पहले कि मार्था कुछ कह पाती, वह युवक मुसकरा कर हाथ हिलाता हुआ शौप की दहलीज से उतर कर आगे बढ़ गया.

मार्था एक गहरी कसक लिए उसे जाता देखती रह गई.

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बेगाने देश में मददगार की सूरत में रूबरू हुए उस शख्स के जादुई सम्मोहन और लच्छेदार बातों में आ कर आस्ट्रेलियाई मूल की मार्था जोंस ने बाद में कितनी जलालत भुगती, उसे उस ने कांपतीलरजती जुबान में एक ही लफ्ज में समेट दिया, ‘‘वह किसी दरिंदे से भी बदतर था.’’

दरअसल, नीरज ने मार्था को प्रभावित करने के लिए अपनी शराफत को बड़े सलीके से सजासंवार कर उस के सामने पेश किया था. मार्था के साथी इतनी जल्दबाजी में पुष्कर जाने को तैयार नहीं थे. बहरहाल, जिस वक्त नीरज उस के होटल पहुंचा, मार्था अपने कमरे में अकेली थी. वह उस के लिए पैकेज के टिकट ले कर आया था.

मार्था की बारबार मनुहार के बावजूद नीरज पुष्कर पैकेज की रकम लेने को तैयार नहीं हुआ. अलबत्ता उस ने यह कह कर उसे चौंकाया, ‘‘पुष्कर जाने का मन तो मेरा भी है. लेकिन कोई मनचाहा संगीसाथी नहीं मिला, अब तुम मिल गईं तो भला मैं यह मौका क्यों छोड़ता. मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा.’’

मार्था नीरज के हावभाव से पहले ही बुरी तरह प्रभावित थी. उस की इस बात ने उस की खुशी को दोगुना कर दिया. अब वह सफर में अकेली नहीं थी, उसे मनचाहा साथी मिल गया था.

मार्था पर क्या गुजरी, पुलिस में दर्ज उस की रिपोर्ट रोंगटे खड़े कर देती है. पुष्कर पहुंचने के बाद वह और नीरज सरोवर में बोटिंग, ब्रह्मा मंदिर दर्शन और कैमल सफारी का आनंद लेते हुए वीडियो रिकौर्डिंग करते रहे. शाम को होटल पहुंचे तो दोनों बुरी तरह थके हुए थे. थकान मिटाने के लिए दोनों ने जम कर व्हिस्की पी.

मार्था ने पुलिस को बताया, ‘‘नीरज होशोहवास में लग रहा था, लेकिन मेरी आंखें मुंदी जा रही थीं. मुझे जानबूझ कर उस ने ज्यादा पिलाई थी. वह मुझ पर हावी होता जा रहा था, जबकि मैं अपने आप को काबू में नहीं रख पा रही थी.

जलालत की हद तब हुई जब उस ने यह कहते हुए मेरे साथ जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाए कि तुम फारनर्स तो इस तरह के संबंधों के आदी होते हो. मुझ पर बेहोशी तारी होती जा रही थी. दर्द की लहर मेरे पूरे जिस्म के पोरपोर में भर गई थी. जब होश आया तो नीरज कहीं नहीं था. मेरा सामान और भारीभरकम रकम सब गायब थे. मेरे पहनने के कपड़ों के अलावा मेरे पास कुछ नहीं बचा था. अलबत्ता मार्था को बिलखते देखने के लिए वहां कोई था तो केवल होटल का स्टाफ.

केस भले ही दर्ज हो गया, लेकिन नीरज का पकड़ा जाना इतना आसान नहीं था. कौन जाने उस का नाम नीरज ही था या कुछ और, वह था कहां का. बहरहाल, केस के चक्कर में मार्था भारत में ज्यादा नहीं रुक सकती थी. उस के पास पैसे भी नहीं थे. फलस्वरूप वह एंबेसी से मदद ले कर अपने देश लौट गई.

टर्किश युवती टेसर सेजी की कहानी कुछ अलग है. ओस से भीगी सुबह भले ही हलकीफुलकी ठिठुरन पैदा कर रही थी, लेकिन पुष्कर के रेतीले धोरों पर मतवाली हवाओं में लहराती सी टर्किश बाला टेसर सेजी अपनी कामुक काया से आसपास के लोगों को करंट जैसा झटका दे रही थी. आकर्षक चेहरा, बारीक भौंह, उम्र तकरीबन 22-23 साल. लंबी, छरहरी, गौरांग टेरिस सेजी नशे के सुरूर में ठुमक रही थी. यह भी कह सकते हैं कि अपने यौवन के खुमार में उत्पात मचा रही थी.

जो भी हो, नशे की तमतमाहट ने उस की जवानी की रौनक को दोगुना कर दिया था. वह चलती थी तो उस का लंबा जिस्म बांस की तरह लचकता था. मदहोशी में उस के झूमने का क्या सबब था, कौन जाने. अलबत्ता उस की उन्मुक्तता और गोरी चमड़ी पर लट्टू होने वालों की भीड़ उस के इर्दगिर्द जुटती जा रही थी. परमानंद की अवस्था में पहुंचने की बेचैनी में वह ‘शिवा…शिवा…’ की रट लगाती हुई टूटीफूटी अंगरेजी में ‘आई वांट टू बी फेमस…’ का प्रलाप करते हुए बताने की कोशिश कर रही थी कि वह यहां क्यों आई है.

केसरिया रंग के झीने ब्लाउज में से उस के अंग झांकते से लग रहे थे, साथ ही वह बैंगनी रंग की छाप वाला लोअर पहने थी. टेसर तमाशबीनों को सरकस जैसा मजा दे रही थी. कामकिलोल की मादक भंगिमाओं के साथ शरीर का भड़काऊ प्रदर्शन तमाशबीनों को बेकाबू करता, इस से पहले ही वहां पुलिस आ गई.

उसे काबू करने के लिए एएसआई श्रवण कुमार को काफी मशक्कत करनी पड़ी. अस्पताल पहुंचने तक उस ने कितनी कलाबाजियां खाईं, उस की गिनती न भी करें तो कपालेश्वर तिराहे  पर दरख्तों से बंधे कैमल सफारी वाले ऊंटों के साथ उस का गलबहियां करना तो पूरी पुलिस टीम के लिए काफी भारी पड़ा.

तुलसी गेस्टहाउस में उस के साथ ठहरी उस की महिला मित्र जैकलीन ने जो सूरतेहाल बयान किया, वह चौंकाने वाला था. सेजी के सिर हशीश का नशा चढ़ गया था. बड़े तड़के ही सेजी केरला गोल्ड (शुद्ध हशीश) में अपना पसंदीदा फ्लेवर मिला कर गाढ़े धुएं के नशे में रम गई थी. तभी से वह बेहाल थी. अस्पताल लाने के बाद उसे नींद का इंजेक्शन दिया गया, लेकिन नशे के जबरदस्त डोज के कारण वह भी बेअसर रहा और उस का प्रलाप चलता रहा, ‘आई वांट काम एंड पीस…आई वांट टू बी फेमस.’

तीर्थराज के नाम से देश भर में प्रख्यात पुष्कर का आध्यात्मिक पहलू समझें तो पुष्कर झील में स्नान किए बगैर चारधाम की यात्रा को भी अधूरा माना जाता है. छोटेछोटे मंदिरों और घाटों की वजह से पुष्कर को छोटा बनारस भी कहते हैं.

यहां के पारंपरिक पुष्कर मेले की तो विदेशों में भी खूब धूम है. ऊंटों के झुंडों की गहमागहमी के साथ पुष्कर के सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य तो भुलाए नहीं भूलते. उस समय तो पुष्कर में उच्छृंखलता की घटाटोप घटाएं उमड़ रही थीं, जब शहर में कुछ अरसा पहले ही पर्यटन के नए सवेरे के रूप में पुष्कर मेले में ‘सेक्रेड म्युजिकल फेस्टिवल’ हुआ था.

हकीकत में पर्यटन के रुपहले परदे के पीछे एक भरीपूरी काली दुनिया भी उसांसें भरती है. यह वो पुष्कर नहीं है जिस की आध्यात्मिक छवि लोगों के जेहन में बसती है, बल्कि यह विदेशी सैलानियों की निर्लज्जता और मौजमस्ती का ऐसा घिनौना और दागदार चेहरा भी है, जिसे कोई नहीं देखना चाहता, फिर भी देखना उन की मजबूरी है. यहां शहर की सड़कों, रेत के धोरों, होटलों की छतों, झील के घाटों और पर्वतों की तलहटी में विदेशी पर्यटक हाथ थाम कर प्यार का इजहार ही नहीं करते, बल्कि पूरी लंपटता के साथ मिथुन भंगिमाओं को मूर्तरूप देते हुए भी नजर आ जाते हैं.

कच्ची फैनी की गंध बिखेरती तंग लिबास में बलखाती अर्द्धनग्न विदेशी बालाएं कब आप के करीब से तूफानी अंदाज में गुजर जाएं, पता भी नहीं चलेगा. झील के किनारे नंगधडंग पसर कर धूप सेंकने का इनका अंदाज ही निराला है. कभी धूपछांव तो कभी बारिश की बूंदों सी मचलती इन विदेशी बलाओं के माध्यम से प्यार, दोस्ती, फरेब और लंपटता की छोटीछोटी कहानियां सिलसिलेवार आगे बढ़ती हैं.

कभीकभी एस्टेसी और हशीश की खुराक से परमानंद में आने की बेचैनी इन में बलात संसर्ग की कामना भी जगा देती है. सैक्स रैकेटों की कहानियों की भी यहां कोई कमी नहीं है. पुष्कर एक कश में ‘निर्वाण’ के तलबगारों के लिए ही स्वर्ग नहीं है, बल्कि यहां वहशत का लुच्चा बाजार भी है जो रेव पार्टियों और ट्रांस पार्टियों की शक्ल में फलफूल रहा है.

टर्किश युवती टेसर सेजी क्या बुरी तरह डिप्रेशन में थी? आखिर उस की मनोदशा इस तरह पगलाई हुई युवती जैसी क्यों थी? क्यों वह फेमस होने और सुकून की तलाश का राग अलाप रही थी?

सूत्रों के हवाले से बात करें तो टूटीफूटी अंगरेजी में उस की सहेली जैकलीन ने जो बताया, उस का निचोड़ चौंकाने वाला था. बीते कुछ सालों की मानसिक त्रासदी ने टेसर की जिंदगी के पन्नों को कुछ इस तरह जलाया कि वह अपना चैनसुकून खो बैठी. उसे अपने वर्तमान में कुछ नजर नहीं आता था. यहां तक कि उसे अपना भविष्य और भी ज्यादा स्याह दिखने लगा था.

हशीश और एस्टेसी तो उस के लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुके थे. यह कडि़यल नशा बाबाओं की सोहबत का नतीजा था, जिस में गोते लगाना भारत की आध्यात्मिक परंपराओं का हिस्सा रहा है. जैकलीन ने अपनी फ्रैंड टेसर की व्यथाकथा के मूल कारणों की गिरह खोली.

पिछली बार जब टेसर भारत आई थी तो किसी नागा बाबा के संपर्क में आ गई थी. बाबा ने उसे अपनी शागिर्द भी बना लिया था. लेकिन कुछ दिन बाद नागा बाबा एकाएक कहीं चले गए और लाख कोशिश के बावजूद भी उसे नहीं मिले.

उस ने सुबकते हुए बताया, ‘‘बस, तभी से टेसर बुरी तरह डिप्रेशन में है. उस की बेकाबू मदहोशी की भी यही वजह है.’’

पुष्कर की यह कोई एक कहानी नहीं है. पुष्कर में ऐसी हजारों कहानियां बिखरी पड़ी हैं. आए दिन अपने आप से निर्लिप्त हो कर नशे की मदहोशी में कभी अर्द्धनग्न तो कभी बेलिबास घूमना, सरेआम सैक्स के लिए आमादा हो जाना या फिर नंगधड़ंग हो कर शहर की सड़कों पर दौड़ लगाना, यहां के लोगों के लिए अचंभित करने वाले दृश्य नहीं हैं.

यह सिलसिला भले ही थोड़ा रुकता हो, लेकिन थमता बिलकुल नहीं. नशा तो पुष्कर की नसनस में समा गया है. हर दूसरा पर्यटक जेब में चिलम और रोलिंग पेपर लिए घूमता है. इस के असर से पुष्कर के पुरातनपंथी इलाके भी नहीं बचे हैं.

दबेछिपे तरीके से नशा हर जगह मुहैया है. चरस और गांजा तो यहां चिप्स और कोल्डड्रिंक्स की तरह मिल जाते हैं. हशीश से जुड़ा सामान तलाशने के लिए भी ज्यादा जहमत उठाने की जरूरत नहीं पड़ती.

नशे का जुगाड़ कराने वाले दलाल इटली की चिलम से ले कर अमेरिकी आर्किड की खुशबू वाला पेपर तक मुहैया करा देते हैं. पर्यटकों को और क्या चाहिए? ऐसे नशे में मदहोश और उन्मत्त हो कर विदेशी सैलानी जिस लंपटता पर उतारू हो जाते हैं, उसे देख कर वहशत होने लगती है.

पिछले दिनों एक विदेशी युवती तान्या ने होली बाथ के नाम पर बदकारी का ऐसा नजारा पेश किया कि पूरा शहर शर्मिंदगी में डूब गया था. फिनलैंड की एरिका नामक युवती ने भी ऐसा ही कुछ किया कि देखने वालों के होश फाख्ता हो गए. पहले तो उस ने पूरे कपड़े उतार कर पुष्कर सरोवर के वराह घाट में छलांग लगाई. फिर पानी की सतह पर तैराकी की मुद्रा में चित्त लेट कर लोगों को सैक्स के लिए आमंत्रित करते हुए पूरे सरोवर का चक्कर लगा दिया.

उस की बेशरमी पर कोहराम मचा तो उस ने घाट पर पहुंच कर नंगधड़ंग ही अपने होटल की ओर दौड़ लगा दी. यह संभवत: पहला दृश्य था, जब पुष्कर के लोगों ने नंगी युवती को सड़कों पर दौड़ते देखा.

लोग इसे अभी भूले भी नहीं थे कि एक होटल की छत पर एक विदेशी युवती निर्वस्त्र हो कर अपने पुरुष मित्र के साथ सहवास करते देखी गई. बाद में सनक के चलते वह तेजी से सीढि़यां उतरी और उस ताल में छलांग लगा बैठी, जहां देव प्रतिमाएं बताई जाती हैं. आश्चर्य की बात यह कि इन दृश्यों पर अंगुलियों तो अनेक उठीं लेकिन उसे लताड़ा किसी ने नहीं.

समाजशास्त्रियों का कहना है कि सार्वजनिक स्थलों पर लोगों को आपत्तिजनक स्थितियों में देख कर कोहराम मचाने वाले सांस्कृतिक वालंटियर पुष्कर में क्यों सक्रिय नजर नहीं आते? आखिर यह स्वच्छंदता है या पर्यटन के नाम पर लंपटता का प्रदर्शन?

जापानी युवती मिशेल के लिए पुष्कर एक सपना था, लेकिन सपनों का शहर नहीं. उस के कुछ दोस्त जो पुष्कर हो कर आए थे, उन्होंने उसे पुष्कर के बारे में बढ़चढ़ कर बताया था. फलस्वरूप उस की उत्कंठा प्रबल हो उठी थी. लेकिन पुष्कर का सफर उस की जिंदगी की एक कड़वी याद बन कर रह गया.

मिशेल पुष्कर के जिस गेस्टहाउस में रुकी, वही उस के सपनों की कब्रगाह बन गया. इस से बड़ा विश्वासघात क्या होगा कि जिस गेस्टहाउस के मैनेजर को उस ने अपनी सुरक्षा के लिए 50 हजार रुपए की बड़ी रकम अदा की, वही उस का बलात्कारी बन गया. इतना ही नहीं, उस के रुपएपैसे भी चुरा लिए गए.

बड़ी मुश्किल से वह वहां से बच कर निकली और किसी तरह आगरा पहुंची, जहां उस ने कुछ जानकार लोगों की मदद से रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस ने गेस्टहाउस मैनेजर और उस के कुछ सहयोगियों को गिरफ्तार भी कर लिया. लेकिन इस मामले की छानबीन की गई तो पुलिस यह जान कर अचरज में पड़ गई कि मिशेल के संबंध अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया से थे.

ताज्जुब है कि औनलाइन मैगजीन ‘स्मार्ट ट्रैवल एशिया’ की ओर से किए गए सर्वेक्षण में  पूरे एशिया में राजस्थान को बेस्ट होलीडे डेस्टिनेशन के रूप में छठा स्थान मिला है. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कहती हैं, ‘‘कोशिश करेंगे, हम और आगे जाएं.’’ आगे जाना गौरव की बात होगी, लेकिन क्या भदेस रंगों के साथ आगे जाना ठीक होगा?

बकौल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ‘हम ने राजस्थान में अंतरराष्ट्रीय पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नया ग्लोबल प्रचार अभियान शुरू किया है. इस अभियान का उद्देश्य राज्य में विदेशी पर्यटकों की संख्या दोगुनी कर के 30 लाख तक पहुंचानी है. बिलकुल नए अंदाज के इस अभियान से पर्यटकों को राजस्थान आने के लिए प्रेरित करना है.’

लेकिन पर्यटन के लिए आने वाली विदेशी युवतियों की बेहयाई का क्या होगा जो तमाम सीमाएं तोड़ देती हैं. कुछ दिन पहले पुष्कर की सावित्री पहाड़ी की तलहटी में बेशरमी का नंगा नाच हुआ. कथित रूप से भारतइजरायल का यह मिलाजुला सांस्कृतिक उत्सव था.

इजरायली बालाओं ने पहले अश्लील चुटकुले सुनाए, फिर शराब के नशे में संगीत की धुन पर स्ट्रिप्टीज की तर्ज में थिरकते हुए न केवल अपने कपड़े उतार फेंके, बल्कि अपने पुरुष साथी के कपड़े उतारने का भी दुस्साहस किया.

कितनी ही विदेशी युवतियों ने पर्यटन की आड़ में यहां स्वच्छंदता, मौजमस्ती और उन्मुक्त यौनाचरण के कीर्तिमान रचे हैं. विदेशी युवतियों की स्वच्छंदता ने धर्मस्थलों के पंडितपुजारियों को भी इतना पथभ्रष्ट कर दिया कि वे नैतिकता के तमाम तकाजे भूल कर कामावेश में आ गए.

पिछले दिनों चौंकाने वाली एक घटना तब घटी जब पूजा करते हुए पुजारी ने मंदिर में आई 2 जापानी बालाओं को अंजुरी में पानी भर कर पति का नाम लेने को कहा. उन युवतियों ने अपने आप को अविवाहित बताया तो उन पर बुरी तरह आसक्त पुजारी ने उन्हें गंधर्व विवाह के लिए आमंत्रित कर के खुद को अपना पति मान लेने को कहा. युवतियों ने जब ऐसा करने से इनकार कर दिया तो पुजारी छेड़छाड़ और अश्लील हरकतों पर उतर आया.

नतीजतन दोनों युवतियों वहां से भागीं और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस के बाद तो पुजारी को पुलिस गिरफ्त में आना ही था. बहरहाल इस में कोई संदेह नहीं है कि पुष्कर समेत राजस्थान के जोधपुर, उदयपुर सरीखे रमणीक ऐतिहासिक शहरों में झीलों और नहरों के किनारे अकसर ट्रांस पार्टियां होती रहती हैं, जिन में नशे में धुत युवकयुवतियों को आपत्तिजनक स्थितियों में फैलेपसरे देखा जाना सामान्य सी बात है.

बेशक राजस्थान विदेशी पर्यटकों की पसंदीदा जगह बन गया है, लेकिन क्या पर्यटन की आड़ में सांस्कृतिक मूल्यों का सर्वनाश करने और सैक्स अपराधों को बढ़ावा देने की इजाजत देना ठीक होगा?

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भले ही लोक देवताओं का खूबसूरत पैनोरमा बना कर धार्मिक और घरेलू पर्यटकों को बढ़ावा देने की कोशिश में हैं. लेकिन क्या इस बेहयाई की कीमत पर? उधर इन घटनाओं को ले कर अजमेर संभाग की पुलिस महानिरीक्षक मालिनी अग्रवाल का कहना है, ‘पर्यटन को अपराध का खोल पहनाने वाले तत्वों पर लगाम कसने के लिए पुलिस पूरी तरह मुस्तैद है.’