कश्मीर का कटोरा
जम्मूकश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की बोलने और रहनसहन की अपनी खास मौलिक शैली है जब वे बोलते हैं तो लगता है कि जीभ होंठों के बीच में कहीं दबी है और कोई गुलाम अली गजल गा रहा है. पर उमर अब गातेगाते चिल्लाने लगे हैं. वजह, नरेंद्र मोदी हैं जिन की पहुंच नहीं, बल्कि दृष्टि इतनी व्यापक हो गई है कि उन्हें कश्मीर भिखारी राज्य नजर आने लगा है जो हर वक्त केंद्र के सामने कटोरा लिए खड़ा रहता है.
पर असल बात निर्धनता या लोकतांत्रिक भिक्षा नहीं, बल्कि धारा 370 और कश्मीर की शांति है. इस बाबत उमर की पीठ थपथपाई जा सकती है. अब यह तो मोदी की मोतियाबिंदी नजर है जो पीठ के बजाय पेट की बात ऐसे कर रही है मानो गुजरात केंद्र से सहायता नहीं मांगता हो, बल्कि उलटे उसे देता हो. 
इशारा साफ है कि अगर मोदी का दिवास्वप्न पूरा हो पाया तो सब से पहले कश्मीर की इमदाद खत्म करना उन की प्राथमिकता रहेगी.
 
टौयलेट रीडर
गोआ के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर शौचालय में पढ़ते हैं यह बात खुद उन के मुंह से जान कर किसी को खास हैरत नहीं हुई क्योंकि आजकल अधिकांश लोग शौचालय में ही साहित्य सेवन करते हैं. पर्रिकर की इस बात से जरूर सहमत हुआ जा सकता है कि वह इकलौती जगह है जहां आप अबाध यानी बेरोकटोक पढ़ सकते हैं. बैडरूम और ड्राइंगरूम को टीवी निगल गया है, ऐसे में लोगों के पास वाकई सुकून वाली इकलौती जगह शौचालय बची है जहां वे पढ़ने का अपना शौक पूरा कर सकते हैं.
शौचालय में पढ़ने को अब भारतीय अन्यथा नहीं लेते. वजह, बदलती जीवनशैली है और छोटे होते घरों में बंधक बने रहने के एहसास से आजादी भी है. जरूरत इस बात की है कि शौचालय पाठकों को प्रोत्साहित करने के लिए कोई अभियान चलाया जाए पर इस से पहले सर्वेक्षण करना जरूरी है कि कितने प्रतिशत भारतीय टौयलेट रीडर हैं.
 
अरविंद दर्शन
एक अमेरिकी पत्रिका द्वारा जारी की गई सूची में आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल का नाम दुनिया के 100 शीर्ष विचारकों में 32वें नंबर पर शामिल हो गया है. ईमानदारी शब्द ही इतना बेईमान हो गया है कि उस पर लोग भगवान सरीखा भरोसा करते हैं जो होते हुए भी नहीं है और नहीं होते हुए भी है. यानी विश्वास करना ऐच्छिक है, अनिवार्य नहीं. पहले अरविंद केजरीवाल ने ज्यादा चिंतनमनन किया होगा, ऐसा लग नहीं रहा. वे बुद्ध जैसे सैकड़ों दार्शनिकों की तरह सालभर दिल्ली की गलियों की खाक छानतेछानते विचारकों की श्रेणी में शामिल हो गए पर अच्छी बात यह है कि वे अपनी तरफ से कोई नया सिद्धांत नहीं थोप रहे. किसी दर्शन का न होना भी अपनेआप में एक दर्शन ही दर्शनशास्त्री मानते हैं.
 
बात और धौंस
विश्व हिंदू परिषद के मुखिया प्रवीण तोगडि़या बोलते नहीं हैं, उन का लहजा ही धौंस सरीखा लोगों को लगता है. इन दिनों तोगडि़या नरेंद्र मोदी के पीछे हाथ धो कर पड़ गए हैं. कभी भी वे गुजरात के हिंदुओं पर अत्याचार की बात करते हैं तो दूसरे ही दिन बयान दे डालते हैं कि नरेंद्र मोदी को मंदिर मुद्दे पर अपना रुख साफ करना चाहिए.
नरेंद्र मोदी चौतरफा दबाव में हैं और आगे भी रहेंगे. हिंदूवादी संगठनों की हिंदुत्व और मंदिर निर्माण की बातों पर खामोश रहना उन की राजनीतिक मजबूरी है क्योंकि सच बोलेंगे तो कांग्रेसी हल्ला मचाने लगेंगे.
जाहिर है, 2014 लोकसभा चुनाव के नतीजों को ले कर हिंदूवादी संगठन या तो अतिआत्मविश्वास के शिकार हैं या आश्वस्त ही नहीं हैं. नरेंद्र मोदी बेचारे 2 पाटों के बीच पिसते शायद यही सोचते रहेंगे कि इस से तो बेहतर गुजरात ही था.