सरिता विशेष

देश में वोटबैंक की राजनीति चरम पर है. राजनीतिक दलों तथा सरकारों द्वारा समुदाय विशेष को लुभाने के लिए लुभावनी घोषणाएं और योजनाएं शुरू करने की होड़ सी मची है. ऐसे में सरकार का यह कहना साहसिक और अच्छा कदम है कि  देश में इसलामिक बैंक खोलने की उस की कोई योजना नहीं है.

कुछ संगठनों और कुछ लोगों की इसलामिक बैंकिंग शुरू करने की सलाह पर अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने स्पष्ट किया है कि सरकार की इस तरह की बैंकिंग व्यवस्था शुरू करने की कोई योजना नहीं है. उन का कहना है कि देश में सभी लोगों की वित्तीय जरूरतों के मुताबिक विभिन्न प्रकार के बैंकों का बड़ा नैटवर्क है और उसे देखते हुए सरकार का समुदाय विशेष के लिए इसलामिक बैंक खोलने जैसा कोई इरादा नहीं है.

इसलामिक बैंकिंग शरीयत के सिद्धांतों पर आधारित होती है और उस व्यवस्था में ब्याज प्रणाली को लागू नहीं किया जा सकता. केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश में अनेक सरकारी और अनुसूचित बैंक हैं और मौजूदा बैंकिंग प्रणाली सुदृढ़ व सब के लिए है. भारत धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश है और यहां बैंक सब के लिए समान अवधारणा पर काम करते हैं. केंद्रीय मंत्री का यह बयान स्वागतयोग्य है. धर्मनिरपेक्ष और पंथनिरपेक्ष राष्ट्र की मजबूती के लिए इस तरह के फैसले अच्छे हैं.

कुछ विश्वविद्यालयों के साथ हिंदू या मुसलिम शब्द लिखने के पहले किए गए प्रयोगों से आज खासी परेशानी हो रही है. भविष्य में किसी बैंक या राष्ट्रीय स्तर के संस्थान का नामकरण किसी जाति, समुदाय या धर्म के आधार पर करने के भी आने वाले समय में कई तरह के दुष्परिणाम हो सकते हैं इसलिए देश में वही काम होने चाहिए जो हमारे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए अच्छे हों और इन के दूरगामी दुष्परिणाम भी न हों.