वाराणसी का पौराणिक नाम ‘काशी’ है. किंतु वर्तमान नाम ‘वाराणसी’ यहां की वरुणा और अस्सी नदियों पर रखा गया है. इसे बनारस नाम अंगरेजों के शासनकाल में दिया गया. गंगा नदी के पश्चिमी किनारे पर अर्द्धचंद्राकार में बसे इस शहर में इतने घाट बने हैं कि इसे घाटों का शहर भी कहा जाता है. दरअसल, यहां का हर घाट पंडों की कमाई का जरिया है जो मोक्ष और गंगा मैया के नाम पर दानदक्षिणा के रूप में भीख मांगते नजर आते हैं. सैलानियों को यहां के पंडों से बच कर सुबह के समय गंगा की खूबसूरती का मजा लेना चाहिए. यहां का कत्थक नृत्य घराना संगीत की दुनिया में अपनी विशेष पहचान रखता है.  बनारसी साड़ी अपनी चमक व डिजाइन के लिए देशभर में काफी लोकप्रिय है.

दर्शनीय स्थल

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय : लगभग 200 एकड़ क्षेत्र में फैले इस विश्वविद्यालय की स्थापना पंडित मदनमोहन मालवीय ने की थी, जिस के मूल में मुख्यत: संस्कृत, भारतीय कला की शिक्षा का उद्देश्य था. लेकिन आजकल यहां हर विषय पढ़ाया जाता है. यह भारत का सब से बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय भी है.

सारनाथ : वाराणसी से 10 किलोमीटर दूर सारनाथ एक बौद्ध स्थल है. यह बनारसगाजीपुर मार्ग पर स्थित है. यहां पर सम्राट अशोक के शासनकाल में बनाए गए अनेक स्तूप हैं. अशोक ने यहां एक स्तूप बनवाया था. इस स्तूप के समीप खंभे का निर्माण करवाया था जिस पर 4 शेर बने हुए हैं, जो आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न है.

सारनाथ संग्रहालय : सारनाथ में एक पुरातात्त्विक संग्रहालय भी है जहां बुद्ध की प्रतिमाएं और शिलालेख रखे हुए हैं. यहां पर प्राचीन काल के बरतन कुछ बेहतरीन चित्र, बौद्ध धर्म की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का चित्रण मौजूद है. यहां गुप्त काल का सब से बड़ा संग्रह मौजूद है.

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