झांसी शहर अपने इतिहास के लिए प्रसिद्ध है और इसे नाम व मान देने में रानी लक्ष्मीबाई ने अहम भूमिका अदा की थी. रानी लक्ष्मीबाई ने हाथ में तलवार ले कर अंगरेजों के दांत खट्टे कर दिए थे और जीतेजी फिरंगियों को किले में घुसने नहीं दिया. आज भी बच्चे इन पंक्तियों को बड़े ही गर्व से गाते हैं :
‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी.’
झांसी दिल्ली से करीब 415 किलोमीटर दूर है20.7. यह शहर लगभग वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. यहां का नजदीकी हवाई अड्डा ग्वालियर है जो किलोमीटर की दूरी पर है.
नेशनल हाइवे 25 और 26 से जुड़ा यह शहर अपनी ऐतिहासिक लोकप्रियता के कारण पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है.
दर्शनीय स्थल
किला : झांसी का ऐतिहासिक किला ओरछा के राजा वीर सिंह जूदेव ने 1610 में बंगरा की पहाड़ी पर बनवाया था, जो आज भी अपनी पहले की स्थिति में मौजूद है जबकि 1857 में इस किले पर अंगरेजों ने गोले बरसाए थे. झांसी का किला और इस से संबंधित झांसी राज्य 18वीं शताब्दी में मराठों के हाथ में चला गया था. मराठों के अंतिम शासक गंगाधर राव थे, जिन की मौत 1853 में हुई थी. उन के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने शासन की बागडोर संभाली थी.
किले में रखी ‘भवानी शंकर’ और ‘कड़क बिजली’ नामक अष्टधातु की बनी तोपें लक्ष्मीबाई की वीरता की याद ताजा करती हैं. झांसी के दुर्ग का भीतरी भाग आकर्षक एवं दर्शनीय है. झांसी का किला आज भी अपने कल के वैभव का प्रतीक है.
रानी महल : शहर के बीच रानी महल का निर्माण महाराज रघुनाथ राव और महारानी लक्ष्मीबाई के समय में हुआ था. रानी महल का पुराना नाम ‘बाई साहब की हवेली’ था. इस महल की रंगबिरंगी पच्चीकारी, चित्रकारी और कला के नमूने आज भी मौजूद हैं जिन्हें देख कर अतीत की शिल्पकला का एहसास होता है. बड़ीबड़ी ढलानों की मेहराबों पर पत्थर की कारीगरी प्राचीन शिल्प को सुरक्षित रखे हुए है. अंगरेजों के खिलाफ अपने सरदारों में विद्रोह की भावना रानी के इसी महल में भरी थी. रानी महल में पुरातत्त्व विभाग का संग्रहालय है जिस में बुंदेलखंड के चांदपुर एवं दुहाई स्थलों से लाई गई मूर्तियां हैं. यह महल शहर के बीचोंबीच स्थित है.
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