Hindi Story : घनश्याम शुक्ला बिहार के छपरा जिले में शिवनगरी गांव का रहने वाला 45 वर्षीय अधेड़ उम्र का आदमी था. 15 साल पहले घनश्याम गांव में पंडिताई का काम करता था. रुकरुक कर उस की थोड़ीबहुत कमाई हो जाया करती थी, लेकिन बंधा हुआ पैसा हाथ नहीं रहता था.

जैसेजैसे परिवार बढ़ता गया, वैसेवैसे घनश्याम को पंडिताई के पेशे की कमाई नाकाफी लगने लगी. इस मारे घनश्याम गांव से दिल्ली शहर काम के लिए रवाना हो गया. लेकिन शहर आने के बाद भी घनश्याम ने पंडिताई का काम नहीं छोड़ा.

दिल्ली के आनंद पर्वत इंडस्ट्रियल इलाके में लोहे की फैक्टरी में घनश्याम की नौकरी लगी थी. वह दिन में फैक्टरी में काम करता और जब भी पंडिताई का काम आता तो शाम का प्लान बना लगे हाथ उसे भी कर लिया करता.

आसपास के रहने वाले लोगों को भी घनश्याम सस्ता पंडित पड़ता था, तो मुंडन, बरसी, गृह प्रवेश इत्यादि में बुला लिया करते थे. और फिर घनश्याम के लिए यह काम मानो रेगिस्तान में पानी के जैसे था तो अच्छा तो लगना ही था, और अच्छा लगेगा भी क्यों नहीं, इस में साइड से पैसे भी बनने लग गए थे.

घनश्याम का पूरा परिवार गांव में रहता था. 5-6 साल पहले तक तो घनश्याम की पत्नी उस के कहने पर बीचबीच में शहर आ जाया करती थी, लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं थी.

जो किराए का कमरा पहले पत्नी के आने से हिलौरे पैदा करता था और बड़ा लगता था, अब ढलती जवानी के साथ कमरे का आकार भी छोटा लगने लगा था. ऊपर से बूढ़े मांबाप के कारण घनश्याम की नैतिकता पत्नी को शहर लाने से रोक रही थी.

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