"यार, वीकेंड फौर्म हाउस में गुजारते हैं इस बार, कैसा रहेगा?"अविनाश ने पत्नी सुलभा से पूछा.

"वाह, बढ़िया रहेगा. 24 घंटे इस पौल्यूशन में रह कर दम घुटने लगता है. बच्चों की भी आउटिंग हो जाएगी," सुलभा ने खुशी से हामी भरी।

"अरे सुनो, तुम्हें बताना भूल गया था, बाबूजी का फोन आया था गांव से कि कुछ समय हम उन के साथ गांव में रहें, बोलो क्या कहती हो? फौर्म हाउस की बजाए अपने गांव, अपने खेत बच्चों को दिखा लाएं? वहां का आनंद ही कुछ और होगा," अचानक अविनाश ने कुछ सोचते हुए कहा.

"अरे नहीं, अभी तो फौर्म हाउस ही चलो, गांववांव फिर कभी चलेंगे, मैं मेरी फ्रैंड ऐश्वर्या से भी कह दूंगी कि वह भी अरुण के साथ चलने की तैयारी कर ले, काफी समय से उस के साथ वक्त नहीं गुज़ारा है. सुनो ननकू से अभी से बोल दो कि वह पास के गांव के सरपंच से बुलौक कार्ट मांग लाए, बच्चों को बुलौक कार्ट राइडिंग का मजा भी आ जाएगा," सुलभा ने साफ मना कर दिया.

"ठीक है भाई, अब बनावट हम लोगों पर इस कदर हावी है कि बनावटी फौर्म ही भाता है, वास्तविकता से तो हमारे रिश्ते टूटते ही जा रहे हैं. बनावटी फौर्म, दिखावटी रिश्ते, चलो चलते हैं फौर्म हाउस," अविनाश बनावटी हंसी हंसते हुए बोला.

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
USD10
 
सब्सक्राइब करें

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD79
 
सब्सक्राइब करें
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...