बरामदे में कुरसी पर बैठा सिगरेटें फूंकता और आसमान ताकता रहता. लगता सारा आसमान खाली है ठीक मेरे मन की तरह. मेरे जीवन में बहुत कुछ बदल गया था जिस के लिए मैं तैयार न था पर न जाने क्यों इस बदलाव को रोकने का कोई तरीका समझ नहीं आता था. जीवन नर्क बन गया था.

‘‘सब यों ही चलता रहा. औरतों से मुझे नफरत हो गई थी. हर लड़की को देख भावना का चेहरा याद आता. ‘मुझे उस से बदला लेना है,’ यही दिमाग में रहता. आज भी यही हाल है. हर शाम एक औरत मेरे साथ होती है. मैं क्लब में जाता हूं, उस के साथ शराब पीता हूं और घर आ कर सो जाता हूं. औरत को बढि़या सा गिफ्ट जरूर देता हूं. हां, स्त्री को ‘टच’ नहीं करता हूं. न जाने क्यों छूने का मन नहीं करता.

‘‘मेरे जीवन में अब स्त्री के लिए कोई जगह नहीं है. आज तुम्हें देख कर न जाने क्यों मन खुश हो गया. मिहिर कितना खुशहाल है जिसे तुम्हारे जैसा जीवनसाथी मिला है.

‘‘एक मैं हूं... एकदम अकेला. खाली घर की सिमटी दीवारों के बीच कैद हो कर रोता हूं... रमला मैं जीवन से हार गया हूं.’’

रमला ने देखा वह फूटफूट कर रो रहा था. उस का मन उद्विग्न था. उस का मन किया रूपेश को कंधे से लगा ले. किंतु वह ऐसा नहीं कर सकी. पति कभी भी आ सकता है. इस हालत में देख कर कहीं गलत न समझे. फिर भी उस ने धीरे से कंधा थपथपाया, ‘‘तुम्हारे साथ जो हुआ वह गलत हुआ.’’

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