कस्तूरी की गंध में बौराया तनु का प्रौढ़ मन उस चौखट पर जा कर खड़ा हो जाता है, जब राहुल से उस की पहली भेंट हुई थी.

ढोलक की थाप पर विवाहगीतों के रस से सराबोर ‘मेहंदी’ की रात के शोरगुल को चीरती हुई एक बुलंद आवाज, चित्त को आकर्षित करने वाला वह व्यक्तित्व... शुभा ने परस्पर परिचय करवाया,

‘ये हैं राहुल भैया. इलैक्ट्रोनिक्स इंजीनियर, यूएसए से एमबीए कर के कंपनी में डीजीएम हैं और यह है, हमारी प्रिय सहेली तनुश्री, आर्क्योलौजी में एमए, फ्रैंच और स्पैनिश में डिप्लोमा, संगीतविशारद और शहर की एक बेहतरीन ट्रैवल एजेंसी में टूरिस्ट गाइड है.’

सबकुछ तनु के मस्तिष्क में तैरता रहा.

महीनेभर बाद ही तिरुअनंतपुरम के टूरिस्ट होटल में तनु की राहुल से दूसरी भेंट हुई. समुद्रतट पर बैठ कर दोनों ने एकदूसरे के बारे में जाना. मित्रता का सिलसिला यों शुरू हुआ. फिर जब भी राहुल दिल्ली आता, तनु से जरूर मिलता. जब भी वे मिलते, खूब बातें होतीं, आफिस की, मित्रों की, किताबों की. वे पल अत्यंत रोचक, अर्थपूर्ण और गंभीर होते.

अनजाने में ही उन्हीं क्षणों में वास्तविकता के ठोस धरातल पर परिपक्व प्रेम का अंकुर पौधे के रूप में विकसित हो गया था.

यों ही 11 माह सरक गए और एक दिन राहुल के साथ पुणे से अम्माजी, बाबूजी और प्रभा दीदी आए और गोद भर कर शादी की तारीख तय कर गए थे. खुशहाल परिवार में अगले ही वर्ष नीतू के जन्म का जश्न मनाया गया था. 12 बरस बीत गए, पर अब भी राहुल के आत्मीय स्पर्श से दौड़ जाने वाली सिहरनें वैसे ही रही हैं जैसे देह का प्रथम परिचय था.

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