Sheikh Hasina: एक लोकतान्त्रिक देश में भी नेता कई बार खुद को लोकतंत्र से ऊपर समझने लगते हैं लेकिन एक समय ऐसा भी आता है जब उन्हें उसी लोकतंत्र में सिर छुपाने की जगह तक नहीं मिलती. शेख हसीना बांग्लादेश की ऐसी ही नेता रहीं जिन्होंने 15 साल तक खुद को बंगलादेश का मसीहा समझने की भूल की और फिर कुछ हफ्तों में सब खत्म. शेख हसीना 2009 से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं. उनके शासन में देश की इकोनॉमी तो ठीक ठाक रही लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने लोकतंत्र का गला घोंटने का भी काम किया. विपक्ष पर कार्रवाई, पत्रकारों पर दबाव, अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक और चुनाव में धांधली जैसे कामों ने उनका पतन तय कर दिया.
शेख हसीना ने जनवरी 2024 में लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की थी. बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीएनपी ने इस चुनाव का बहिष्कार किया था और हसीना पर दिखावटी चुनाव कराने का आरोप लगाया था. यह सिर्फ आरोप नहीं थे बल्कि बांग्लादेश के कई आजाद मीडिया ग्रुप्स ने सबूतों के साथ चुनाव में हुई धांधली को उजागर किया था. शेख हसीना ने आरोपों का जवाब देने की बजाय डराने का रास्ता अपनाया और अपोजिशन के नेताओं के खिलाफ दुश्मनी निकालनी शुरू कर दी. नाजायज तरीके से हासिल बहुमत मिलने से शेख हसीना की सरकार लगातार निरंकुश और अलोकतांत्रिक हो गई और इस निरंकुश तानाशाही ने विरोधियों के खिलाफ बर्बरता का रास्ता अपनाना शुरू किया जिससे जनता भड़क उठी और शेख हसीना के साम्राज्य का तख्त पलट गया.
2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ. धीरे-धीरे यह सरकार विरोधी जन आंदोलन बन गया. जब लाखों लोग सड़कों पर उतर आए और सुरक्षा बल भी हालात नहीं संभाल पाए तो 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को इस्तीफा देकर भारत भागना पड़ा. बांग्लादेश में नई सरकार बनने के बाद शेख हसीना पर 2024 के आंदोलन के दौरान हुई मौतों और दमन के मामलों में मुकदमे दर्ज किये गये और इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल ने उन्हें गैरहाजिरी में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई. अब बांग्लादेश सरकार भारत से उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रही है ताकि वे अदालत का सामना करें.
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