दिन के पास थीं दास्तानें कितनी
संजोए थी रात भी ख्वाब हसीं
कहने खूबसूरत किस्से थे
सुननी रुबाइयां कुछ भीनी
ठिठक गया चांद
रुपहली खिड़की पर कुछ पल
चांदनी छन्न से बिखर गई
नदियां हंस पड़ीं खिलखिल कर
जरा अकड़, तन गया पर्वत कोई
घाटियों ने गहरी सांसें लीं
दरख्तों ने धरी होंठों पे उंगलियां
शांत हुए भंवरे
चंचल तितलियों की धमाचौकड़ी भी
थम गई बेसाख्ता
झुक सा गया कुछ आसमां
धरा चिहुंकी, थरथरा गई
कुछ दरका, चटखा भी कहीं कुछ
थोड़ा सा लहका, तो बरस भी गया
ज्वार उफना...उतर गया
कुछ अधजला
या अधबुझा सा
सुलगता ही रह गया
चांद के दिल में बस इक कसक
बाकी रह गई.
- डा. छवि निगम
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