School Education: हाल ही में जारी यूडीआईएसई 2025-26 के आंकड़े देश की स्कूली शिक्षा की एक चौँकाने वाली तस्वीर पेश करते हैं. आंकड़े चिंताजनक हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि कक्षा 1 में स्कूल जाने वाले सभी बच्चे 12वीं तक नहीं पहुंच पाते. प्राइमरी स्तर तक रिटेंशन लगभग 91 परसेंट है. मिडिल स्तर तक यह घटकर 83 फीसदी रह जाता है और सेकेंडरी यानी 9 से 10वीं तक 70 प्रतिशत बच्चे ही पढ़ाई जारी रखते हैं वहीं हायर सेकेंडरी यानी 11-12वीं तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा केवल 52 फीसदी ही रह जाता है.
इसका मतलब यह है कि अगर 100 बच्चे पहली कक्षा में दाखिला लेते हैं तो लगभग 48 बच्चे 12वीं तक पहुंचने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं. इसके अलावा 10वीं पास करने वाले केवल 78 फीसदी स्टूडेंट ही 11वीं में एडमिशन लेते हैं जबकि लगभग 22 परसेंट बच्चे यहीं पढ़ाई से बाहर हो जाते हैं.
देश में लगभग 14.67 लाख स्कूलों में 24.72 करोड़ स्टूडेंट्स पढ़ रहे हैं. सरकार के अनुसार औसतन 24 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध है लेकिन कई राज्यों में स्थिति अब भी चुनौतीपूर्ण है. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में लगभग 4.27 करोड़ विद्यार्थियों पर 16.42 लाख शिक्षक हैं और 2 लाख 65 हजार स्कूल हैं. बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के हालात भी कुछ ऐसे ही हैं.
आंकड़े बताते हैं कि अभी भी लगभग 30–32 प्रतिशत स्कूलों में डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. यानी देश के हर तीन स्कूलों में से लगभग एक स्कूल में कंप्यूटर, स्मार्ट क्लास जैसे डिजिटल संसाधनों की कमी है. ऐसे हालात में नई शिक्षा नीति के तहत 10+2 व्यवस्था की जगह 5+3+3+4 मॉडल लागू किया गया है.
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