कालिज का वार्षिकोत्सव था. छात्रों की गहमागहमी के बीच प्राचार्य शीला वर्मा व्यस्त थीं. तभी एक महिला अपने 8 साल के बच्चे के साथ वहां पहुंची और प्राचार्य का अभिवादन कर बोली, ‘‘मैम, मैं उमा हूं.’’ प्राचार्य शीला ने उसे गौर से देखा तो देखती रह गईं. उन्हें अपनी आंखों पर सहज भरोसा नहीं हो रहा था. उन की आंखों के सामने जो उमा खड़ी थी वह संपन्नता की प्रतिमूर्ति थी जबकि उन्होेंने जिस उमा को देखा था वह दीनहीन दुर्बल काया थी.

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