Easy Divorce Process : जरूरत तो अब इस बात की है कि सरकार विधि मंत्रालय के जरिये धारा 13 ( बी ) का प्रचार इश्तहार की तरह करते कहे कि आइए इस धारा के तहत तलाक लीजिए और तलाक के मुकदमे की परेशानियों तनाव व झंझटों से शीघ्र मुक्ति पाइए. क्योंकि लगभग शर्तिया तलाक गारंटी की परस्पर सहमति वाली इस धारा का इस्तेमाल न के बराबर होता है. अब सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले के बाद उम्मीद बंधी है कि पतिपत्नी उक्त परेशानियों से बचने इसे अपनाने की पहल करेंगे.
“कोई भी अदालत आपसी सहमति से तलाक को रोकने मजबूर नहीं है जिस में पतिपत्नी दोनों पक्ष शादीशुदा जिंदगी के सुख के बजाय खाई में धकेल दिए जाएं. जो कपल्स तलाक के लिए अदालत का रुख करते हैं उन के पास इस के लिए जायज वजहें होती हैं और अगर तलाक की कार्रवाई में देरी हो इस से उन के संबंध बनाने की काबिलियत पर बुरा फर्क पड़ता है.”
बीती 17 दिसम्बर को दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच के जस्टिस नवीन चावला, जस्टिस अनूप जयराम भंभानी और जस्टिस रेणु भटनागर ने तलाक के एक मुकदमे के फैसले में इस राय को अदालत में रखा तो हर किसी को हैरानी हुई कि हाई कोर्ट तलाक की इतनी जोरदार पैरवी क्यों कर रहा है. यह हैरानी बेंच के इन शब्दों को सुन दूर होती नजर आती है, “कुछ मामलों में तलाक में देरी करने से पति या पत्नी दोनों के भविष्य की उम्मीदों को स्थाई नुकसान पहुंच सकता है जिस से उन्हें अपनी जिंदगी को दोबारा संवारने या संबंध बनाने में अड़चन पेश आती है.” और इस से भी ज्यादा अहम ये शब्द कि `जब दोनों पतिपत्नी विवाह समाप्त करने पर पूरी तरह राजी हों तो इसे जारी रखने के लिए मजबूर करना केवल सामाजिक नैतिकता का दिखावा मात्र है. दिखावे को बनाए रखने, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अहमियत और भावनात्मक सुख की कीमत पर नहीं हो सकता.”
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