भाग 1

नेहा घबराई हुई थी, सागर की रिपोर्ट्स जो आनी थीं आज. नेहा ने सोते हुए सागर के चेहरे पर नजर डाली, क्या हुआ है सागर को, कितना कमजोर होता चला जा रहा है. फिर वह मुंबई के मुलुंड इलाके में तीसरे फ्लोर पर स्थित अपने फ्लैट की बालकनी में आ खड़ी हुई. यहां से उसे सोसाइटी का मेनगेट दिखाई पड़ता है. उस ने दूर से ही देख लिया कि रिया अपनी स्कूटी से आ रही है. उस का मन और बु झ गया.

यह रिया भी उसे चैन से नहीं जीने दे रही है. सागर के बचपन की इस दोस्त पर उसे बहुत गुस्सा आता है. कभी कुछ कह नहीं पाती. सोचती है, कह दिया तो सागर की नजरों में गिर जाएगी. पर कभी वह सागर और रिया की दोस्ती पर शक करती, कभी जासूसी करती, कभी उन के हावभाव देखती.

सागर को नेहा के मातापिता ने पसंद किया था. सागर का स्वभाव, व्यवहार देख कर नेहा को अपने पर गर्व ही हुआ था. वह सागर के साथ अपने वैवाहिक जीवन में पूरी तरह सुखी और संतुष्ट थी.

अब नेहा के मातापिता नहीं रहे थे. बहनभाई कोई था नहीं. सागर के भी मातापिता का सालों पहले देहांत हो चुका था. एक बड़ा भाई था, जो अपने परिवार के साथ अमेरिका में ही बस गया था. विवाह के बाद ही सागर का ट्रांसफर दिल्ली से मुंबई हो गया था. और एक दिन यहां उसे अचानक एक मौल में रिया मिल गई थी. सागर जबरदस्ती रिया को साथ घर ले कर आया था. फिर तो दोनों की बातें खत्म ही नहीं हुई थीं.

सागर ने उसे बताया था कि दिल्ली में एक ही गली में दोनों के घर थे. दोनों साथ ही पढ़े थे. पढ़ाई के बाद रिया जौब के लिए मुंबई आ गई थी. बीच में कभीकभार दोनों की फोन पर ही बात हुई थी. रिया अपने मातापिता की एकमात्र संतान थी. उस के मातापिता इस समय दिल्ली में ही रह रहे थे.

अब तो रिया कभी भी उन के घर आ धमकती थी. रिया वैसे नेहा को पसंद आई थी. स्मार्ट, सुंदर, मस्तमौला, खुशमिजाज लड़की थी. यहां एक एमएनसी में अच्छे पद पर कार्यरत थी. वह 2 लड़कियों के साथ फ्लैट शेयर कर रहती थी.

डोरबैल की आवाज से नेहा की तंद्रा भंग हुई. हाथ में खूब सारे पैकेट ले कर रिया अंदर आई. सब पैकेट टेबल पर रख कर सीधे सागर को देखने बैडरूम में गई. कुछ आहट पा कर सागर ने आंखें खोलीं.

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‘‘कैसे हो?’’ रिया ने पूछा.

‘‘ठीक हूं.’’ सागर मुसकरा दिया.

‘‘कुछ नाश्ता लेती हुई आई हूं, सब खाते हैं,’’ रिया बोली.

नेहा ने कहा, ‘‘तुम खा लो, मेरा मन नहीं है.’’

रिया ने नेहा को स्नेहपूर्वक, अधिकार के साथ आंखें दिखाईं, ‘‘चुपचाप खा लो. अभी तुम्हारा राजकुमार भी स्कूल से आने वाला होगा. फिर उस की सेवा में लग जाओगी. चलो, अब शांति से बैठ कर कुछ खा लो.’’

नेहा अब मना नहीं कर पाई. वह सागर के लिए फल काट कर लाई और अपने दोनों के लिए चाय. सागर ने 2 टुकडे़ ही खाए थे कि फिर उस के पेट में तेज दर्द उठा. वह पसीनेपसीने हो गया. नेहा फिर घबरा गई.

रिया ने कहा, ‘‘रहने दो, सागर. तुम

कुछ मत खाओ. अब रिपोर्ट्स

आ ही जाएंगी, पता चलेगा क्या परेशानी है. लो, थोड़ा पानी पियो.’’ रिया ने सागर के मुंह में 2 चम्मच पानी डाला. नेहा के हाथपांव फूल रहे थे. रिया ने कहा, ‘‘अब तुम लोगों का डाक्टर के पास जाने का टाइम हो रहा है. मैं यहीं रुकती हूं. यश स्कूल से आएगा तो मैं उसे देख लूंगी.’’

नेहा ने उस की तरफ कृतज्ञताभरी नजरों से देखा तो रिया हंस पड़ी.

‘‘ज्यादा मत सोचो, तैयार हो जाओ. कभी मेरी तबीयत खराब होगी न, तो इतनी सेवा करवाऊंगी कि याद रखोगे.’’

दर्द में भी हंसी आ गई सागर को, बोला, ‘‘तुम हमेशा बकवास ही करना.’’ रिया ने उसे घूरा तो नेहा दोनों को देखती रह गई. अकसर दोनों की खुली दोस्ती को सम झने की नेहा कोशिश ही करती रह जाती थी.

यश स्कूल से आ गया तो नेहा उस के साथ व्यस्त हो गई. रिया आराम से सागर के पास बैठ कर बातें कर रही थी. अब तक यश भी रिया से काफी घुलमिल चुका था. यश को रिया के पास छोड़ सागर और नेहा अस्पताल चले गए.

नेहा रिपोर्ट्स ले कर डाक्टर के रूम के बाहर अपने नंबर की प्रतीक्षा कर रही थी. सागर निढाल बैठा हुआ था. नेहा चिंतामग्न थी. उस के विवाह को 8 साल ही तो हुए थे. सागर के पेट में काफी समय से बहुत तेज दर्द की शिकायत थी. वह कोई पेनकिलर खा लेता था, दर्द ठीक हो जाता था. पर इस बार नेहा की जिद पर वह अपना चैकअप करवाने आया था. बहुत सारे टैस्ट हुए थे.

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अपना नंबर आने पर नेहा डाक्टर सतीश के हाथ में रिपोर्ट देते हुए मन ही मन बहुत घबरा रही थी. उस की हथेलियां पसीने से भीग उठी थीं. वह सागर की गिरती सेहत को ले कर बहुत फिक्रमंद थी. डाक्टर की गंभीरता देख कर तो सागर भी असहज हो उठा.

‘‘सब ठीक तो है न, डाक्टर साहब?’’

‘‘नहीं, मिस्टर सागर, कुछ ठीक नहीं है. आप को आंतों का कैंसर है.’’

‘‘नहीं, डाक्टर,’’ नेहा लगभग चीख ही पड़ी, ‘‘यह कैसे हो सकता है.’’ सागर तो जैसे पत्थर का हो गया था.

‘‘ज्यादा चिंता मत करें. आप ऐडमिट हो जाइए, इलाज शुरू करते हैं, कीमोथेरैपी होगी. आजकल हर बीमारी का इलाज है. आप लोग देर न करें. इलाज शुरू करते हैं.’’ लगातार बरसती आंखों से सागर को ऐडमिट करवा कर नेहा फिर डाक्टर के पास गई, पूछने लगी, ‘‘डाक्टर, सागर ठीक तो हो जाएंगे न?’’

‘‘कोशिश तो पूरी की जाएगी लेकिन रिपोर्ट्स के हिसाब से इन के पास मुश्किल से 6 महीने ही हैं. कैंसर पूरी तरह से फैल चुका है. आप लोगों ने आने में बहुत देर कर दी है.’’

अपनेआप को संभालती, रोतीसिसकती नेहा ने रिया को सब बताया तो उसे भी तेज  झटका लगा. फिर तुरंत अपनेआप पर काबू रखते हुए कहा, ‘‘तुम वहीं रहो, मैं रात को भी यहीं घर पर रहूंगी. कल यश को स्कूल भेज अस्पताल आ जाऊंगी. फिर तुम फ्रैश होने घर आ जाना. किसी भी बात की चिंता मत करना. मैं औफिस से छुट्टी ले लूंगी.’’ नेहा को सम झा कर, तसल्ली दे कर, फोन रख कर रिया भी फूटफूट कर रो पड़ी. यह क्या हो गया, उस का दोस्त इतनी बड़ी बीमारी की चपेट में आ गया. अब क्या होगा. नेहा अकेले कैसे सब करेगी. इन दोनों का तो कोई है भी नहीं यहां. अब उसे ही इन का सहारा बनना है.

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अगले दिन यश को स्कूल भेज, सब का खाना बना कर, मेड से घर की साफसफाई करवा कर रिया अस्पताल पहुंच गई. वह सामान्य ढंग से सागर और नेहा से बातें करती रही. सागर तो अब मानसिक रूप से भी निढाल हो चुका था. उस ने नेहा को जबरदस्ती घर भेज दिया. उस के वापस आने तक रिया सागर से हमेशा की तरह हलकीफुलकी बातें करती रही. एकदो बार सागर को हंसा भी दिया. फिर सागर भी थोड़ा सहज हो कर बातें करता रहा.

कहानी का दूसरा भाग पढ़ें अगले हफ्ते.

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