Hindi Kahani: जैसेजैसे रात बढ़ रही थी वैसेवैसे ठंड का प्रकोप बढ़ता जा रहा था. हवाओं में कुहरे की नमी घुलने लगी थी. हवाएं काफी तेज थीं, उन पर घुली हुई बर्फ सुईयों की तरह चुभो रहीं थीं.
बस अपनी गति से भागती जा रही थी. सारी खिड़कियां बंद थीं, फिर भी न जाने किस सुराख से हवाएं घुस कर काट डालने को तैयार थीं. बहुत दिनों बाद मैं अपने गांव जा रहा था, नौकरी के लगने के लगभग पांचछह साल बाद. अगर विमल दादा के बीमार होने की खबर न आई होती तो शायद मैं जाता भी नहीं. मां ने कई बार मिन्नतें कर कहा था, ‘विमल दादा, तुम्हें बहुत याद करते हैं. एक बार जा कर मिल लो. जिंदगी का कुछ भरोसा नहीं, बाद में कहीं अफसोस न रह जाए.’
विमल दादा मेरे दादाजी के यहां मुलाजिम थे. खेतीबाड़ी से ले कर वकालत तक का काम वही संभालते थे. हमारे ही घर में रहते थे, एक पारिवारिक सदस्य की तरह. धीरेधीरे समय बदला, दादाजी नहीं रहे. दादाजी के गुजरने के बाद गांव की जमींदारियत विमल काका के भरोसे ही रह गई थी. गांव जाना सालभर में मुश्किल से दो या तीन बार होता था. एक कुलदेवी के पूजन के समय, दूसरा फसल की रोपनी और कटनी के समय.
दो साल पहले मेरे पिता भी नहीं रहे. हृदय गति रुक जाने से अचानक ही उन की मृत्यु हो गई थी. पापा के जाने के बाद मेरा गांव जाना लगभग छूट चुका था. बचपन में गांव जाने के नाम पर ही जितनी खुशी होती थी, अब उतना दुख होता था. जब भी मां मुझ से गांव चलने के लिए कहती, मैं कोई न कोई बहाना ले कर टाल दिया करता था.
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