यौवनावस्था में कदम रखने वाली मुन्नी के स्वभाव का बचपना न जाने कब मोहित के प्यार में खो गया, खुद उसे ही नहीं पता चला. मोहित व कविता के बीच आखिर ऐसा क्या हुआ कि वह पूरी तरह से टूट गई और खुद की नजरों में ही गिर गई.

‘‘मम्मी, मेरा लंच बौक्स,’’ कविता चिल्लाती हुई रसोईघर में घुसी.

‘‘तैयार है, तू खुद लेटलतीफ है, देर से उठती है और सारे घर को सिर पर उठा लेती है. यह अच्छी बात नहीं है.’’

‘‘बस, मम्मी, हो गया. अब दो भी मेरा लंच बौक्स. कल से जल्दी उठूंगी,’’ कविता अपनी मम्मी की तरफ देखते हुए बोली.

उस की मम्मी भी उस पर ऊपरी मन से गुस्सा करती थीं. उन्हें पता है कि कविता नहीं सुधरने वाली. उस का यह रोज का काम है.

कविता ने प्यार जताने के लिए मम्मी को गले लगाया और बोली,

‘‘बाय मम्मी.’’

‘‘बाय बेटा, पेपर अच्छे से करना.’’

कविता की मां नम्रता अपने रोजमर्रा के काम निबटाने में व्यस्त हो गईं. कविता के घर में उस के मातापिता, 1 भाई, दादादादी, ताऊताई व उन की 2 बेटियां रहते हैं. कविता अपने घर में सब से छोटी है और सब की लाड़ली है. सब उस से बहुत प्यार करते हैं. प्यार में सब उसे मुन्नी कहते हैं.

कविता 17 साल की एक सुंदर लड़की थी. उस का भराभरा सा सुडौल शरीर और चंचल स्वभाव सहज किसी को भी आकर्षित करने लायक था. उस को गांव में सभी प्यार से मुन्नी बुलाते थे. यौवनावस्था में कदम रखने वाली मुन्नी के स्वभाव में अभी तक बचपना था. उस की 12वीं कक्षा की वार्षिक परीक्षाएं चल रही थीं. पेपर देने के लिए उसे अपने गांव से 18 किलोमीटर दूर कसबे के उच्च माध्यमिक विद्यालय में जाना पड़ता था.

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