लेखक: मनीष जैन

अमर में न जाने ऐसी क्या बात थी कि न चाहते हुए भी उस की बातों पर मेरा दिमाग विश्वास नहीं कर पा रहा था लेकिन दिल उस की बातों को झुठला भी नहीं पा रहा था. दिल और दिमाग की कशमकश में उलझा मैं इस उस की मदद को तैयार हो गया.

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