घर वालों को नन्ही सी नूरी की भी चिंता नहीं. जी में आया भैया के सामने जा कर तन कर खड़ी हो जाऊं और चिल्लाचिल्ला कर कहूं कि वे सचाई को स्वीकार करना सीखें. पल्लवी की नादानी का परिणाम 2 परिवारों की दुश्मनी में न बदलने दें. परंतु हिम्मत नहीं हो पाई. कल क्या उन्होंने कुछ कम सुनाया था. कह कर अपनी ही बेइज्जती करानी पड़ती.

भैया सब को समझाते रहे कि कल कचहरी में जज के सामने तरुण व उस के मांबाप के खिलाफ क्याक्या कहना है? कौन से आरोप लगाने हैं? कितने सुबूत प्रस्तुत करने हैं?

मां और पिताजी भैया की बातों को देर तक रटते रहे ताकि सबकुछ ठीकठाक याद हो जाए और कचहरी में उन का पलड़ा हलका न पड़े.

लेकिन मैं हतप्रभ थी. तरुण के विरुद्ध अनर्गल विषवमन किस प्रकार से कर पाऊंगी? उस सीधे, सच्चे, निर्दोष इंसान पर मिथ्या दोषारोपण कैसे कर पाऊंगी? उस की आत्मीयता, स्नेह का क्या यही बदला रह गया है मेरे पास? मैं कशमकश के भारी दौर से गुजर रही थी.

अदालत जाते वक्त भी मैं तनावग्रस्त थी व अपनेआप पर संयम रखने का पूरा प्रयास कर रही थी. यह वक्त मेरी अग्निपरीक्षा जैसा था. फिर लोगों की भारी भीड़ के बीच मेरे मांबाप, भैयाभाभी तरुण व उस के मांबाप के ऊपर भांतिभांति के लांछन लगाते रहे.

भैया के वकील ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी. जब मेरा नाम ले कर पुकारा गया तो मेरे पैर दोदो मन के हो रहे थे. एक कदम बढ़ाना भी भारी लग रहा था.

मैं ने देखा, थोड़ी दूर खड़े भैया मेरी ओर आंखें फाड़े यों घूर रहे थे जैसे कच्चा चबा डालेंगे.

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