नई दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से स्पेशल राजधानी एक्सपे्रेस चली तो नीता अपने जीजाजी को नमस्कार कर अपनी सीट पर आ कर बैठ गई. एक हफ्ता पहले वह अपनी बीमार मां को देखने आई थी. मुंबई तक का सफर लंबा तो था ही, उस ने बैग से शरतचंद्र का उपन्यास ‘दत्ता’निकाल लिया. सफर में किसी से ज्यादा बात करने की उस की आदत नहीं थी, सफर में उसे कोई अच्छा उपन्यास पढ़ना ही अच्छा लगता था.

नीता अपनी सीट पर बैठी सोच ही रही थी कि पता नहीं आसपास की खाली सीटों पर कौन लोग आएंगे, इतने में 7 युवा लड़के आ गए और सीट के नीचे अपना सामान रखने लगे.

उन लड़कों को देख कर नीता का दिमाग घूम गया, ऐसा नहीं कि लड़कों को देख कर उसे घबराहट हुई थी. वह 40 साल की आत्मविश्वास से भरी महिला थी. 18 साल की उस की एक बेटी और 15 साल का एक बेटा भी था. उसे यह घबराहट युवा पीढ़ी के तौरतरीकों से होती थी. उस ने सोचा कि अब मुंबई तक के सफर में उसे चैन नहीं आएगा. लड़के हल्लागुल्ला करते रहेंगे, न खुद आराम करेंगे न उसे करने देंगे.

उन लड़कों ने अपना सामान रख कर आपस में बातें करनी शुरू कर दीं. नीता ने अपना चेहरा भावहीन बनाए रखा और अपने उपन्यास पर नजरें जमा लीं, लेकिन कानों में उन की बातें पड़ रही थीं. लड़के मुंबई कोई इंटरव्यू देने जा रहे थे. अब तक नीता खिड़की पर बैठी थी, पैर फैलाने की इच्छा हुई तो जैसे ही पैर आगे बढ़ाए उस की बर्थ पर बैठे लड़के तुरंत खड़े हो गए और बोले, ‘‘मैडम, आप आराम से बैठ जाइए.’’

नीता ने उन पर नजर डाले बिना गरदन हिला दी. पैर फै ला कर अपना दुपट्टा हलके से ओढ़ कर वह आंख बंद कर के लेट गई. आज की युवा पीढ़ी के लिए उस के मन में बहुत दिन से आक्रोश जमा होता जा रहा था. घर पर अकसर बच्चों से उस की बहस हो जाती है. उसे लगता है, बच्चे उस की बात नहीं समझ रहे हैं और बच्चों को लगता है मम्मी को समझाना मुश्किल है. बच्चों से वह हमेशा यही कहती, ‘मैं इतनी बूढ़ी नहीं हूं कि जवान बच्चों की बात न समझ सकूं लेकिन तुम लोग बात ही ऐसी करते हो.’

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लेटेलेटे नीता को याद आया कि पिछले महीने वह पार्लर में फेशियल करवा रही थी तो वहां पर 2 लड़कियां भी आई हुई थीं. उन के रंगढंग देख कर उसे बहुत गुस्सा आ रहा था. वे लगातार अपने मांबाप की सख्ती, शक्की स्वभाव और कम जेबखर्च का रोना रो रही थीं. फिर धीरेधीरे उन्होंने अपने दोस्त लड़कों की आशिकी, बेवफाई और प्यारमनुहार की चर्चा शुरू कर दी थी. घर आ कर भी काफी देर तक उस के दिमाग में उन लड़कियों के विचार घूमते रहे थे.

मुंबई में नीता अकसर संडे को अपने पति अमित के साथ घर से कुछ ही दूरी पर स्थित उपवन लेक पर शाम को टहलने जाती है. लेक के चारों तरफ घने पेड़ों की हरियाली देख कर उस का प्रकृतिप्रेमी मन खुश हो जाता है. वहां शाम होतेहोते सैकड़ों युवा जोड़े हाथों में हाथ डाले आते और करीब से करीबतर होते जाते. हर पेड़ के नीचे एक जोड़ा अपने में ही मस्त नजर आता. शाम गहराते ही उन की उन्मुक्तता बढ़ने लगती किंतु वाचमैन की बेसुरी सीटी चेतावनी की घंटी होती जो उन्हें सपने से यथार्थ में ले आती. कुछ बहुत ही कम उम्र के बच्चे होते, बराबर में स्कूल बैग रखे बहुत ही आपत्तिजनक स्थिति में आपस में खोए रहते. नैतिकता, संस्कार किस चिडि़या का नाम है आज का युवावर्ग नहीं जानता. कायदेकानून न मानने में ही उन्हें मजा आता है.

इसी प्रकार का मंथन करते हुए नीता भयभीत हो कर हाई ब्लडप्रेशर की शिकार हो जाती. उसे अपने युवा बच्चों की चिंता शुरू हो जाती. उस लेक पर जाना उसे बहुत अच्छा लगता था लेकिन वहां के माहौल से उस के मन में उथलपुथल मच जाती और उस की चिड़चिड़ाहट शुरू हो जाती. अमित माहौल को हलके ढंग से लेते, उसे समझाते भी लेकिन नीता का मूड मुश्किल से ठीक होता.

अटेंडेंट ने आ कर कंबल आदि रखे तो नीता वर्तमान में लौटी. खाना टे्रन में ही सर्व होना था, वह घर से अपने खाने के लिए कुछ ले कर नहीं चली थी. हां, उस की मम्मी ने बच्चों की पसंद की बहुत सी चीजें साथ बांध दी थीं. खाना खा कर नीता लेट गई तो लड़के कुछ देर तो आपस में धीरेधीरे बातें करते रहे फिर नीता को सोता हुआ समझ कर धीरे से बोले, ‘‘चलो, हम लोग भी लेट जाते हैं, बातें करते रहेंगे तो मैडम डिस्टर्ब होंगी.’’

नीता की आंखें बंद थीं लेकिन वह सुन तो रही थी. वह थोड़ी हैरान हुई. लड़के चुपचाप अपनीअपनी बर्थ पर लेट गए, नीता भी सो गई. सुबह उठने पर पता चला कि टे्रन बहुत लेट है.  फे्रश हो कर वह आई तब तक चाय और नाश्ते की ट्रे आ गई. लड़के भी नाश्ता कर रहे थे. नाश्ता कर के नीता उपन्यास में लीन हो गई. बीचबीच में उन लड़कों की बातें सुनाई दे रही थीं. लड़के कभी फिल्मों की बातें कर रहे थे तो कभी अपने सीनियर्स की, कभी अपने घर वालों की. आपस में उन का हंसीमजाक चल रहा था. उपन्यास पढ़तेपढ़ते नीता थोड़ी असहज सी हो गई. उसे सिरदर्द शुरू हो गया था.

नीता को इसी बात का डर रहता था कि वह बाहर निकले और कहीं यह दर्द शुरू न हो जाए और अब दर्द बढ़ता जा रहा था. काफी समय से वह शारीरिक रूप से अस्वस्थ चल रही थी. आधे सिर का दर्द, हाई ब्लडप्रेशर और अब कुछ महीने से अल्सर की वजह से उस की तबीयत बारबार खराब हो जाती थी. नीता ने तुरंत उपन्यास बंद किया और उठ कर बैग में से अपनी दवा की किट निकालने की कोशिश की तो उसे चक्कर आ गया और वह ए.सी. में भी पसीनेपसीने हो गई. लड़के तुरंत सजग हुए, एक बोला, ‘‘मैडम, क्या आप की तबीयत खराब है?’’

नीता बोली, ‘‘हां, माइग्रेन का तेज दर्द है.’’

लड़के ने कहा, ‘‘आप के पास दवा है?’’

‘‘हां, ले रही हूं.’’

‘‘आप को और कुछ चाहिए?’’

‘‘नहीं, थैंक्यू,’’ कहतेकहते नीता ने दवा ली और लेट गई. सुबह के 9 बज रहे थे. एक लड़का बोला, ‘‘मैडम, हम सब ऊपर की बर्थ पर चले जाते हैं, आप आराम कर लीजिए,’’ और लाइट बंद कर के परदे खींच कर सब लड़के चुपचाप ऊपर चले गए. दवा के असर से नीता की भी आंख लग गई.

वह करीब 1 घंटा सोई रही, उठी तो लड़के ऊपर ही लैपटाप में अपना काम कर रहे थे. कोई चुपचाप पढ़ रहा था, उसे जागा हुआ देख कर लड़कों में से एक ने पूछा, ‘‘मैडम, अब आप कैसी हैं?’’

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नीता ने पहली बार हलके से मुसकरा कर कहा, ‘‘थोड़ी ठीक हूं.’’

‘‘मैडम, चाय पीनी हो तो मंगा दें?’’

‘‘नहीं, अभी नहीं, थैंक्यू.’’

‘‘मैडम, सूरत आ रहा है, आप को कुछ चाहिए?’’

नीता ने फिर कहा, ‘‘नहीं.’’

सूरत स्टेशन आया, लड़के कुछ खानेपीने के लिए उतर गए. फिर एक लड़का वापस आया, ‘‘आप को फ्रूट्स चाहिए?’’

‘‘हां,’’ नीता ने कहा और पर्स से पैसे निकालने लगी.

‘‘नहीं, नहीं, मैडम, रहने दीजिए, मैं ले आता हूं.’’

‘‘नहीं, नहीं, पैसे लोगे तभी मंगवाऊंगी,’’ नीता ने मुसकरा कर कहा.

लड़के ने पैसे ले लिए और हंस कर बोला, ‘‘अभी लाता हूं.’’

थोड़ी देर में सब वापस आ गए. लड़के ने नीता को पोलिथीन और बाकी पैसे पकड़ाए. नीता ने एक केला ले कर बाकी के उसी लड़के को दे कर कहा, ‘‘आप लोग भी खा लो.’’

‘‘नहीं, मैडम, हम ने तो स्टेशन पर पकौड़े खाए थे.’’

‘‘खा लो, फ्रूट्स ही तो हैं,’’ नीता ने फिर उपन्यास खोल लिया. उस का मन अचानक बहुत हलका हो चला था. तबीयत भी संभल गई थी. साढ़े 11 बजे मुंबई पहुंचने वाली टे्रन अब 5 बजे पहुंचने वाली थी.

आज पहली बार नीता को लग रहा था कि उस ने अपनी बेटी मिनी की बात मान कर मोबाइल रख लिया होता तो अच्छा होता. वह अमित को टे्रन लेट होने की खबर दे सकती थी. कहीं बेचारे स्टेशन पर आ कर न बैठ गए हों. ठाणे से मुंबई सेंट्रल आना- जाना आसान भी नहीं था. वह मोबाइल से दूर रहती थी, हाउसवाइफ थी, घर में लैंडलाइन तो था ही, बच्चे कई बार कहते कि मम्मी, आप भी मोबाइल ले लो तो वह यही कहती, ‘‘मुझे इस बीमारी का कोई शौक नहीं है, तुम लोगों की तरह हर समय कान में लगा कर रखने के अलावा भी मुझे कई काम हैं.’’

मिनी ने मुंबई से चलते समय कितना कहा था, ‘मम्मी, मेरा मोबाइल ले जाओ, आप सफर में होंगी तो हम आप से बात तो कर पाएंगे, आप का भी समय कट जाएगा, हमें भी आप के हालचाल मिल जाएंगे,’ लेकिन नीता नहीं मानी थी और आज पहली बार उसे लग रहा था कि मिनी ठीक कह रही थी.

लड़कों ने शायद नोट कर लिया था कि उस के पास मोबाइल नहीं है. एक लड़का बोला, ‘‘मैडम, आप चाहें तो हमारे फोन से अपने घर टे्रन लेट होने की खबर दे सकती हैं.’’

नीता ने संकोचपूर्ण स्वर में कहा, ‘‘नहीं, नहीं, ठीक है.’’

‘‘मैडम, आप को जो लेने आएगा उसे परेशानी हो सकती है, स्टेशन पर जल्दी ठीक से बताता नहीं है कोई.’’

बात तर्कसंगत थी, नीता को यही उचित लगा. उस ने एक लड़के का फोन ले कर अमित को टे्रन के लेट होने के बारे में बताया. बहुत बड़ा बोझ सा हट गया नीता के दिल से. अब अमित समय से घर से निकलेंगे, नहीं तो स्टेशन पर आ कर बैठे रहते.

नीता के मन में इस सफर में टे्रन के इतना लेट होने पर भी चिड़चिड़ाहट नहीं थी. वह चुपचाप मन ही मन आज के युवावर्ग के बारे में सोचती रही. हैरान थी अपनी सोच पर कि जमाना कितना बदल गया है, कितनी समझदार है आज की पीढ़ी. 2 पीढि़यों का यह अंतर क्या आज का है? यह तो सैकड़ों वर्ष बल्कि उस से भी पहले का है. अंतर बस यह है कि आज के बच्चे मुखर हैं. अपने हक के प्रति सचेत हैं, लेकिन इस के साथ ही वे बुद्धिमान भी हैं, अपने लक्ष्य पर निगाह रखते हैं और सफल भी होते हैं फिर चाहे वह कोई भी क्षेत्र क्यों न हो.

उस ने चुपचाप एक नजर सब लड़कों पर डाली, सब इंटरव्यू की तैयारी कर रहे थे, बीचबीच में हलका हंसीमजाक.

नीता सोच रही थी यह एक्सपोजर का समय है जिस में बच्चे दुस्साहसी हैं तो जहीन भी हैं. बच्चों की जिन गतिविधियों से वह असंतुष्ट थी उन से अपने समय में वह भी दोचार हो चुकी थी. बचपन, जवानी, प्रौढ़ा और वृद्धावस्था की आदतें, स्वभाव, सपने, विचार हमेशा एक जैसे ही रहते हैं और इन के बीच जेनेरेशन गैप की दूरी भी सदैव बनी रहती है. समाज में तरहतरह के लोग तो पहले भी थे, आगे भी रहेंगे. नकारात्मक नजरिया रख कर तनाव में रहना कहां तक ठीक है?

नीता का मन पंख सा हलका हो गया. कई दिनों से मन पर रखा बोझ उतरने पर बड़ी शांति मिल रही थी. मुंबई सेंट्रल आ रहा था, वह अपना सामान बर्थ के नीचे से निकालने लगी तब उन्हीं लड़कों ने उस का सामान गेट तक पहुंचाने में उस की मदद करनी शुरू कर दी, टे्रन के रुकने पर वह उन्हें थैंक्यू और औल द बेस्ट कह कर उतर गई.

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