लेखक- पुखराज सोलंकी

'बहु, मैं छत पर जा रही हूं, अगर कोई आये तो उसे छत पर ही भेज देना, अभी-अभी मेरी हलवाई से फोन पर बात हुई है वो आता ही होगा, हमने जो एक सौ आठ ब्राह्मणों का भोज रखा है न उसी बारे में उससे कुछ बात करनी है.' कहते हुए मनोरमा सीढियों की और बढ़ी.

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