दिल की दहलीज पर: भाग-1

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आखिरी किस्त

‘‘अनुराधा, तुम्हारे जीवन की सचाई जानने के बाद अब मेरा इरादा और भी पक्का हो गया कि मैं शादी तुम से ही करूंगा.’’

जब अनुराधा ने यह बात अपने मामाजी को बताई तो उन की तो खुशियों का ठिकाना ही नहीं रहा. वे बेहद खुश थे. एक दिन अथर्व अनुराधा के मामाजी और अपने कुछ मित्रों को साथ ले कर अपने गांव गया. उस ने अपने बाबूजी और माताजी को यह बात बताई कि मैं ने अनुराधा नाम की एक लड़की को पसंद किया है और उस से शादी करना चाहता हूं.

मातापिता को क्या चाहिए, सिर्फ अपने बेटे की खुशी. उन्होंने खुशीखुशी सहमति दे दी. अनुराधा के मामाजी ने शादी की तारीख एक माह बाद की ही निकाल ली.

अनुराधा के मामाजी ने शहर के एक होटल में उन दोनों की शादी बहुत ही धूमधाम से की. शादी के बाद अथर्व अनुराधा को ले कर गांव आ गया. जब रात हुई तब गांव की कुछ युवतियां अनुराधा को सुहागरात के लिए अथर्व के बैडरूम की तरफ ले जा रही थीं, तभी अचानक उस को चक्कर आने लगे और वह एकदम से गिर पड़ी. हर तरफ शोर मच गया कि नई दुलहन गिर पड़ी. थोड़ी ही देर में एक लेडी डाक्टर को लाया गया. उस ने अनुराधा का नाड़ी परीक्षण किया और फिर सब को रूम से बाहर जाने के लिए कहा. सब के जाने के बाद वे अथर्व से बोलीं, ‘‘शायद ये प्रैग्नैंट हैं.’’

अथर्व ने डाक्टर मैडम से कहा, ‘‘आप से एक निवेदन करना चाहता हूं कि कृपया आप यह बात अपने तक ही रहने दें. यह बात अपने मातापिता को किस प्रकार बतानी है, यह मैं देख लूंगा.’’

फिर डाक्टर बाहर आईं और बोलीं, ‘‘लगता है कि शादी के कार्यक्रमों के कारण दुलहन को थकान हो गई है. इसलिए उसे चक्कर आ गए.’’

रात बहुत हो चुकी थी. सब लोग जा कर सो गए. लेकिन अथर्व अपने बैड पर जाग रहा था कि इस सचाई को सब के सामने किस तरह लाया जाए, क्योंकि वह जानता था कि उन दोनों ने पूर्ण निष्ठा से एकदूसरे से शादी की है और अनुराधा इस मामले में पूर्णतया निर्दोष है.

सुबह होते ही उस ने अपने मातापिता को अपने रूम में बुलाया और कहा, ‘‘मैं आप को एक सचाई बताना चाहता हूं. मुझे विश्वास है कि आप सचाई जानने के बाद हमें माफ करेंगे.

‘‘बाबूजी, हमारी शादी पक्की होने की खुशी में मेरे मित्रों ने मुझ से पार्टी मांगी और मैं ने उन्हें सहर्ष पार्टी दी थी. पार्टी में मजे लेने के हिसाब से किसी मित्र ने मेरे और अनुराधा के शरबत में कोई नशीला पदार्थ मिला दिया. पार्र्टी खत्म होने के बाद सब मित्र अपनेअपने घर चले गए. इस के बाद हम दोनों को नशे की खुमारी चढ़ने लगी और इसी नशे में हम दोनों अपना आपा खो बैठे और उस समय जो नहीं करना था, वह कर बैठे. इस घटना के करीब 3 माह बाद ही हमारी शादी हुई. मुझे आप को यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि आप दोनों दादादादी बनने वाले हैं. लेकिन आप से एक विनती है कि अभी इस खुशी को आप अपने तक ही सीमित रखें. जब वक्त आएगा, तब यह बात हम सब को बताएंगे.’’

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गांव के भोलेभाले मातापिता ने उस की इस बात को खुशीखुशी मान लिया. उस के मातापिता के जाने के बाद अनुराधा बोली, ‘‘आखिर, तुम मेरे लिए कितनी बार झूठ बोलोगे?’’

‘‘यदि किसी एक झूठ से किसी को नया जीवन मिलता हो तो वह झूठ सौ सच से श्रेष्ठ है, समझीं? फिर इस में उस जीव का क्या दोष जो अभी जन्मा तक नहीं है?’’

जब अनुराधा ने यह बात अथर्व के मुंह से सुनी तो वह मन ही मन बहुत खुश हुई. सोचने लगी कि उसे ऐसा समझदार जीवनसाथी मिला है जो केवल उस की सुंदरता पर आकर्षित नहीं है, बल्कि उस की भावनाओं को भी समझता है.

ऐसा भी होता है हमारे जानने वाले की पत्नी मिक्सी में मसाला पीस रही थी. अचानक उस मिक्सी का ढक्कन उड़ कर नीचे गिर गया. उस ने ढक्कन नहीं उठाया और अपना हाथ मिक्सी पर रख कर मिक्सी का बटन औन कर दिया.

मिक्सी के प्रैशर से उस का हाथ पता नहीं कैसे जार में चला गया. बेचारी के हाथ की उंगलियां कट गईं. जरा सी लापरवाही करने से उस के साथ इतनी बड़ी दुर्घटना हो गई.   जीवन खोसला (सर्वश्रेष्ठ)

मैं ट्रेन से ग्वालियर से सहारनपुर आ रही थी. ट्रेन के पहुंचने का समय मध्यरात्रि के बाद का ही था. मैं ने अटैंडैंट से कहा था कि स्टेशन आने पर मुझे बता देना. ट्रेन 2 जगह काफी देर के लिए रुकी, और लेट होती रही. लगभग डेढ़दो बजे कोईर् स्टेशन आया, और मैं उतर गई. स्टेशन पर पति को न देख मैं ने उन्हें मोबाइल मिलाया. मैं ने कहा, ‘‘आप दिखाई नहीं दे रहे.’’ पति बोले, ‘‘मैं कब से खड़ा हूं, टे्रन आई कहां है, तुम कहां हो?’’ तभी मैं ने देखा कि 3-4 लड़के मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए. वहीं एक पुलिस वाला था. उस ने उन को डांट कर वहां से हटाया. ट्रेन तब तक वहीं खड़ी थी. यह देख कर मैं ने फिर पति को फोन किया कि कितनी देर हो गई.

वे फिर बोले, ‘‘अभी ट्रेन आई कहां है, तुम कहां उतरी हो, सहारनपुर ही उतरी हो न?’’ यह सुनते ही मेरा दिमाग काम करने लगा, मैं ने पास खड़े टीटीई से पूछा, ‘‘यह कौन सा स्टेशन है?’’ वे बोले, ‘‘मुजफ्फरनगर.’’ सुनते ही मेरे होश उड़ गए. गनीमत यह रही कि टे्रन खड़ी थी और मैं डिब्बे के सामने थी. ट्रेन में चढ़ कर मैं ने राहत की सांस ली. मेरे पास टीटीई भी खड़े थे, जिन्हें पता था मुझे कहां उतरना है. फिर भी उन्होंने नहीं बताया कि यह सहारनपुर नहीं है.

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उस वक्त मेरा समय सही था. यह अलग बात है कि आजकल मोबाइल हैं और मैं परेशानी से बच गई. पर यह याद मुझे आज भी डरा देती है. मैं कई बार अकेली आतीजाती हूं, इटावा से कई बार हार, जो कि एक छोटा सा स्टेशन है, जहां अकसर लाइट नहीं रहती, स्टेशन का नाम भी नहीं दिखाई पड़ता, वहां भी देख कर उतरती थी. फिर भी इतने बड़े स्टेशन पर मुझ से धोखा हुआ.

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