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लेखक- निखिल उप्रेती

'तुझ संग बैर लगाया ऐसा, रहा न मैं फिर अपने जैसा...' यह गीत मल्होत्रा बेकर्स में आज जोर से बज रहा था.

काव्या के पास रखा मोबाइल फोन बजा तो उस ने खीजते हुए एक नजर सामने मल्होत्रा बेकर्स पर डाली और दूसरी फोन की तरफ.

"जी अंकल कहिए?" कहते हुए उस ने मोबाइल कानों से सटा लिया पर अगले ही पल उस के चेहरे से जैसे सारी रंगत उड़ने लगी.

"क्या हुआ दीदी ?" राजू ने काव्या की ओर देखते हुए पूछा.

"पवन अंकल का फोन था नगरपालिका से। हमें और्डर मिला है पर सिर्फ पैटीज का बाकी का सारा और्डर वह कबीर हड़प कर…" रुंधे गले से काव्या बात पूरी भी नहीं कर सकी.

वह अगले ही पल बेकरी से बाहर आई और तेज कदमों से कबीर की बेकरी की ओर बढ़ने लगी.

"लानत है तुम पर... एक अकेली लड़की से कंपीटिशन करते हो? जीत गए तुम... खुश हो न अब? बजाओ जोर से अब अपना यह संगीत," कहते हुए काव्या ने सामने रखे म्यूजिक प्लेयर का साउंड और बढ़ा दिया.

'तुझ संग बैर लगाया ऐसा, रहा न मैं फिर अपने जैसा...' गीत हवाओं में फिर से तैरने लगा और उधर चुप खड़े कबीर के लबों पर मुसकान भी तैरने लगी.

नगरपालिका द्वारा आयोजित कार्यक्रम का दिन भी आखिर आ ही गया।

सारे बाजार में उस दिन एक अलग ही उन्माद था. हर चेहरे पर रौनक, खुशी, उत्साह। बस, एक काव्या थी जिस के चेहरे से नूर कोसों दूर था.

बुझे मन से वह पैटीज तैयार करने में लगी हुई थी. पैटीज पैक करते हुए उसे ऐसा लग रहा था जैसे यह बेकरी अब धीरेधीरे उस के हाथों से निकलती जा रही है.

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