‘‘दीदी, एक बात कहूं अगर आप बुरा न मानें तो?’’ एक दिन पार्वती ने कहा तो गुनगुनाते हुए डस्टिंग कर रही सविता के हाथ रुक गए. ‘‘क्या जो मैं सोच रही हूं वह सही है?’’ ‘‘हां, पार्वती... तुम मेरी अंतरंग सहेली ही नहीं सब से बड़ी शुभचिंतक भी हो. तुम्हें ये जानने का पूरा हक है कि मेरी जिंदगी में आखिर क्या चल रहा है?’’ कह कर सविता ने पार्वती का हाथ पकड़ कर उसे अपने साथ सोफे पर बैठा लिया.

‘‘प्रतीक के जाने के बाद मेरे जीवन का एक कोना उदास, खाली और वीरान हो चुका था, पर उस वक्त 40 वर्षीया सविता यानी मुझे सामने सिर्फ अपना 16 वर्षीय मासूम बेटा नजर आ रहा था, जिसे पालने की जद्दोजेहद में मुझे अपनी उदासी और अकेलेपन का भान ही न रहा. उस की शादी के वक्त मेरी उम्र 50 पार कर चुकी थी और ढलती उम्र में अपने बारे में सोचना मुझे बचकानी बात लग रही थी. लेकिन पार्वती यह समय है और इस में अगले पल क्या होना है हमें कुछ भी पता नहीं.

‘‘कभी यह बिना इजाजत हम से हमारी सब से प्यारी चीज छीन लेता है और कभी बिना मांगे ही हमारी झोली खुशियों से भर देता है. इतने सालों से मेरे दिल में प्रतीक की जगह कोई नहीं ले पाया और न ही कोई ले पाएगा. पर ओंकार से मिल कर उस कोने की उदासी और अकेलापन दूर हो गया जो प्रतीक के जाने के बाद वीरान था. ‘‘जिंदगी तो पहले भी कट रही थी मगर अब इस के हर पल को जैसे मैं जीने लगी हूं. तुम्हें नहीं पता ओंकार ने भी क्या कुछ झेला है...’’ कहतेकहते सविता कुछ देर को रुकी, ‘‘फौजी होने के नाते सीमा पर वह दुश्मनों से लड़ने में व्यस्त रहा और इधर उस  पत्नी उसे धोखा देने में. पता चलने पर जब उस ने सवाल किया तो इकलौते बेटे को ले कर वह अलग हो गई. एलिमनी राशि और साथ में अपना

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