बेहद खूबसूरत, स्मार्ट, आधुनिक, एक मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर मिहिका आजकल लौकडाउन के चलते वर्क फ्रोम होम ही कर रही थी.

मुंबई के अपने सुंदर से फ्लैट में वह अकेली रहती थी. 38 साल की अविवाहिता मिहिका लाइफ को अपनी शर्तों पर जी कर खुश थी, संतुष्ट थी. अपनी हेल्थ, फिगर का खूब ध्यान रखती, सुंदर थी ही. देखने में वह 25-30 साल की ही लगती. आजकल औफिस के काम के साथसाथ वह माइग्रेंट मजदूरों के लिए भी बहुतकुछ कर रही थी.

सिर्फ जरूरी चीजों की दुकानें ही खुली थीं. काफी सामानों की तो होम डिलीवरी हो ही रही थी.

एक दिन वह यों ही कार निकाल कर सोसाइटी से बाहर निकली. यह भी लग रहा था कि कार खड़ेखड़े बेकार ही न हो जाए.

सोसाइटी से कुछ दूर गांधी नगर था, जहां मजदूरों की बस्ती थी, वहीं आसपास उसे गरीब बच्चे मुंह लटकाए दिख गए.

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स्वभाव से बेहद कोमल मिहिका उसी समय ग्रोसरी स्टोर गई, कई फूड पैकेट्स बनवाए और सीधे गांधी नगर पहुंच गई. बच्चों को आवाज दी, तो बच्चे भागे आए, उन के पीछेपीछे कई बड़े भी आ गए.

भूख, गरीबी से क्लांत चेहरे देख मिहिका ने उसी दिन से एक फैसला ले लिया. अब उस ने ग्रोसरी वाले को फोन किया, "नरेश भाई, जैसे पैकेट्स आज मैं ने लिए हैं, ऐसे रोज 50 पैकेट्स तैयार कर के मेरे फ्लैट पर पहुंचा देना.‘’

''जी मैडम, जरूर. बड़ी नेकी का काम करेंगी.''

अब यह रोज का नियम हो गया. औफिस का काम खत्म होने के बाद मिहिका कार निकालती, खुशीखुशी मजदूरों की बस्ती में जा कर खाना बांट कर आती. इस में उसे एक असीम खुशी मिलने लगी.

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