Kumar Vishwas Controversy: इन दिनों रामकथा बांचकर करोड़ों रु काट रहे भूतपूर्व कवि और वर्तमान धार्मिक बाबा कुमार विश्वास को सुनने लोग टूट पड़ते हैं तो इसकी वजह अब कविताएँ नहीं बल्कि रामायण है. जिसकी कथाए वे इतने भावुक होकर सुनाते हैं कि उपस्थित श्रोता सीधे त्रेतां युग में पहुँच जाते हैं. दर्शकों की आस्था और धर्मभीरुता से चाँदी काटने बालों की देश में कमी नहीं है लेकिन उनमे से अधिकतर मोरारी बापू, पंडित प्रदीप मिश्रा और धीरेन्द्र शास्त्री सरीखे ट्रेडिशनल बाबा हैं.
उलट इसके कुमार विश्वास भाषा और शब्दों के धनी हैं. इनकी आडियंस भी पैसे बाली होती है जिसके लिए धर्म लगभग अय्याशी की चीज होती है. इसमें कोई शक नहीं कि किस्सा गोई का जो हुनर और शैली विश्वास के पास है वह आज के दौर के बाबाओं में तो बिलकुल नहीं है. विश्वास का लहजा कुछ कुछ ओशो यानी रजनीश से मिलता जुलता है. लेकिन ज्ञान और दर्शन के मामले में वे ओशो का सौवा हिस्सा भी नहीं है. उनकी फिलासफी में गैरब्राह्मणवाद के लिए कोई जगह नहीं.
एक उदाहरण से ही यह फर्क समझा जा सकता है शबरी प्रसंग की चर्चा करते ओशो दो टूक कहते हैं कि एक आदिवासी महिला के झूठे बेर बड़े प्रेम से वही खा सकता है जो उससे प्यार करता हो. लेकिन विश्वास इसे भक्ति से जोड़ देते हैं.ओशो जितने मौलिक थे विश्वास उतने ही अमौलिक और नकलची हैं. असल में खुद ब्राह्मण होने के नाते विश्वास ब्राह्मणों को श्रेष्ठता का गान और बखान करने का कोई मौका नहीं छोड़ते. उलट इसके ओशो ब्राह्मणवाद के चिथड़े कुछ इस तरह उड़ाते थे कि ब्राह्मण तिलमिला उठते थे. इन दोनों में इकलौती समानता भक्तो की है. ओशो के अनुयायी रईस लोग ही हुआ करते थे. विश्वास के दर्शक भी पैसे बाले ही होते हैं जो उनके शो का हजारों रु का टिकिट
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