महिलाओं को नौकरियों में आरक्षण से ज्यादा जरूरत धार्मिक जकड़न से आजादी की है. धार्मिक भेदभाव ने उन्हें शुरू से पीछे रखा है. जब महिलाएं इस से बाहर आने लगती हैं तो उन्हें कोई नया कर्मकांडी टोटका पकड़ा दिया जाता है जिस की मंशा उन्हें दबाए रखने की होती है. सुप्रीम कोर्ट की महिला वकीलों द्वारा दिल्ली में 26 सितंबर को आयोजित एक सम्मान समारोह में देश के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण ने यों तो लंबाचौड़ा भाषण दिया लेकिन उस में कई बातें महत्त्वपूर्ण से ज्यादा अर्थपूर्ण थीं, मसलन- द्य न्यायपालिका में 50 फीसदी आरक्षण के लिए महिला अधिवक्ता की तरफ से जोरदार तरीके से मांग उठी.

इस पर न्यायाधीश बोले, ‘मैं नहीं चाहता कि वे रोएं, बल्कि गुस्से से चिल्लाना शुरू करें.’ द्य यह हजारों साल के दमन का विषय है.

आरक्षण अधिकार का विषय है,

दया का नहीं. दुर्भाग्य है कि कुछ चीजें बहुत देरी से आकार लेती हैं. द्य लोग बड़ी आसानी से कह देते हैं कि 50 फीसदी आरक्षण मुश्किल है क्योंकि महिलाओं को अनेक समस्याएं होती हैं. लेकिन, यह सही नहीं है. इस के अलावा एक और बात आज के माहौल के लिहाज से उन्होंने ऐसी कही जिसे सुनने से ज्यादा सम?ाना जरूरी है. हालांकि सम?ाने वाले सम?ा गए थे लेकिन उन की तादाद न के बराबर है.

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यह वाक्य था, ‘दुनिया की महिलाओ, एकजुट हो जाओ. तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के अलावा कुछ नहीं है.’ गौरतलब है कि यह नारा मशहूर कम्युनिस्ट और समाजवादी दार्शनिक काल मार्क्स का है कि ‘दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के अलावा कुछ नहीं है.’ इस नारे ने जो हाहाकारी क्रांति मचाई थी वह किसी सुबूत की मुहताज नहीं है. हालांकि अभी देश में काल मार्क्स का नाम और हवाला देना पूरी तरह गुनाह नहीं है लेकिन कुछ तो है जो सनातनधर्मी और देश के मौजूदा हुक्मरान इस नाम से चिढ़ते भी हैं और खौफ भी खाते हैं. आमतौर पर काल मार्क्स के मानने वालों को ?ाट से वामपंथी व विधर्मी करार दे दिया जाता है.

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