जो तू ब्राह्मण, ब्राह्मणी का जाया|

आन बाट काहे नहीं आया|| (कबीर)

संत कबीर का यह दोहा उन लोगों के लिए सीख है जो आज भी लोगों को नस्ल, जाति, धर्म, लिंग के तौर पर भेद करते हैं. यह दोहा अत्याचार करने वालों पर तमाचा है जिन्होंने सदियों से खुद को शुद्ध या ऊँचा बताया और इसी आधार पर कमजोर व नीच कहे जाने वालों का शोषण किया. आज बेशक कहने को बदलाव हुए हैं लेकिन समय- समय पर यह नस्लीय और जातीय मानसिकता लोगों को शिकार बनाते रहे हैं. फिर चाहे वह भारत हो या दुनिया का कोई भी देश हो.

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