ये कहानी लगती फिल्मी है, मगर है सच. वैजयंती का सपना था कि वह अपने भाइयों की तरह वर्दी पहने, मगर आर्थिक मजबूरियों के कारण 12वीं से आगे की पढ़ाई नहीं कर सकीं. शादी हुई. समय बीतता गया. सोचा, बेटे को वर्दी में देखकर अपना सपना जी लेंगी, मगर यह भी नहीं हो सका. भगवान ने चार बेटियां दीं, लेकिन वैजयंती ने बेटियों को बेटों की तरह पाला. पढ़ाया-लिखाया और अपने साथ दौड़ाया भी. परीक्षा दिलवाने कंधे पर टाइपराइटर ढोकर जाती रहीं. नतीजा सामने है.

वैजयंती की बड़ी बेटी रवि रंजना पटना में महिला थाना प्रभारी है, दूसरी बेटी रवि किरण गुजरात सीआईएसएफ में इंस्पेक्टर तो तीसरी रवि रोशनी आरपीएफ में सब-इंस्पेक्टर है.

वैजयंती जब अपनी तीनों बेटियों को वर्दी में देखती हैं, तो उसमें खुद को महसूस करती हैं. चौथी बेटी रवि रेणुका अभी पढ़ाई कर रही है. उसका सपना भी पुलिस अफसर बनने का है.

55 वर्षीय वैजयंती कहती हैं कि न मैंने कभी बेटियों को बेटों से कम समझा और न बेटियों न यह महसूस होने दिया. चारों बेटियों की 10वीं तक की पढ़ाई कोइलवर में ही हुई. वहां सुबह-शाम जब फुर्सत मिलती, बेटियों को अपने साथ हाई स्कूल के ग्राउंड में दौड़ाने के लिए ले जाती. शुरुआती दिनों में बहनों को दौड़ लगाते देख आसपास के लोग ताना भी मारते थे, लेकिन हमने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया. आज वही लोग मेरी बेटियों का उदाहरण देकर अपने बच्चों को मैदान में दौड़ाने लाते हैं.

2009 में सबसे पहले बड़ी बेटी रवि रंजना को सब इंस्पेक्टर की भर्ती में सफलता मिली. इसके बाद दो अन्य बेटियां भी वर्दी पाने में कामयाब हो गईं.

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