Temple Donations: जिस दौर में क़ानूनी बोर्डों और सरकारी अधिकारियों के प्रबंधन वाले मंदिर भी चोरी और घोटाले से बच नहीं पा रहे हैं वहीं गुरुद्वारों के मामले में एक सदी पुराने क़ानून ने दान की चोरी को कंट्रोल कर दिखाया है. सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 यह क़ानून ब्रिटिश काल में बना था. यह क़ानून ज्यादातर गुरुद्वारों पर लागू है जिसकी वजह से यहां मंदिरों जैसी लूट कम दिखाई देती है.
101 साल पुराना 'सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925' आज भी गुरुद्वारों के दान का हिसाब रख रहा है. ब्रिटिश काल में बने इस क़ानून में SGPC जैसी चुनी हुई बॉडी होती है, ऑडिट होते है और हिसाब सार्वजनिक होता है. इसी कारण गुरुद्वारों में घोटाले की खबरें मंदिरों के मुकाबले बहुत कम दिखाई देती हैं.
दूसरी तरफ वो बड़े मंदिर हैं जो कानूनी बोर्ड और सरकारी अफसरों के हाथ में हैं. फिर भी हर साल चोरी, घोटाला, जमीन बेचने, हूंडी का पैसा गायब होने की खबर आती रहती है. तिरुपति, पद्मनाभस्वामी, सोमनाथ से लेकर छोटे शहर के मंदिर तक से दान गायब हो जाता है. चलो मान लिया जाये कि दान का रुपया आगे से चोरों के हाथ नहीं लग पायेगा लेकिन सवाल ये है कि इतने आलीशान मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च की जरूरत ही क्यों? एक आम आदमी की जिंदगी की एक समस्या का हल धर्म से हुआ हो तो बताइए. नौकरी धर्म से नहीं मिलती. अस्पताल धर्म से नहीं चलते. स्कूल धर्म नहीं बनाता. फिर अरबों का चढ़ावा, संगमरमर और सोना क्यों?
गुरुद्वारों में घोटाले नहीं होते क्योंकि वहां क़ानून अपना काम कर रहा है लेकिन मंदिरों में घोटाले जमकर हो रहे हैं. इससे यह बात तो साबित होती है की धर्म सिर्फ लूटना सिखाता है. दान के पैसे की ऐसी बंदरबाट धर्म के ठेकेदार ही करते हैं. उसूल एक ही है, लोगों को आस्था के नाम पर मूर्ख बनाओ और जब यही मूर्खो की भीड़ मंदिरो के खजाने भरे तो उसे जमकर लूटो.
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