मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति के तहत हिंदी को पूरे देश में अनिवार्य बनाने की नीयत से त्रिभाषा फार्मूले का नया ड्राफ्ट जैसे ही सामने आया, देशभर में इस का विरोध शुरू हो गया. आखिरकार मोदी सरकार को यूटर्न लेना पड़ा.

सत्ता में वापसी से अतिउत्साहित मोदी सरकार ने हिंदू राष्ट्र स्थापित करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाते हुए पहला फरमान जारी किया- हिंदी अब पूरे मुल्क में पढ़ीपढ़ाई जाएगी. यह अनिवार्य भाषा होगी. इस के अलावा दूसरी भाषा इंग्लिश और तीसरी भाषा क्षेत्रीय होगी. देश में ‘त्रिभाषा फार्मूला’ लागू होगा.

केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति के तहत हिंदीभाषा को पूरे देश में लागू करने के उद्देश्य से बनाया गया नया ड्राफ्ट जैसे ही सामने आया, देशभर में इस का विरोध शुरू हो गया. विरोध के तीव्र स्वर खासतौर पर दक्षिण भारत से उठे. मजे की बात यह है कि इस मामले में अपने ही मंत्रियों का विरोध भी प्रधानमंत्री को झेलना पड़ा. हालत यह हो गई कि लोग मरनेमारने तक की बातें करने लगे.

द्रमुक के राज्यसभा सांसद तिरुचि सिवा ने तो केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए यहां तक कह दिया कि हिंदी को तमिलनाडु में लागू करने की कोशिश कर केंद्र सरकार आग से खेलने का काम कर रही है. हिंदी भाषा को तमिलनाडु पर थोपने की कोशिश को यहां के लोग बरदाश्त नहीं करेंगे. हम केंद्र सरकार की ऐसी किसी भी कोशिश को रोकने, किसी भी परिणाम का सामना करने के लिए तैयार हैं.

वहीं, डीएमके अध्यक्ष एम के स्टालिन ने ट्वीट कर कहा कि तमिलों के खून में हिंदी के लिए कोई जगह नहीं है. यह देश को बांटने वाला कदम होगा. यदि हमारे राज्य के लोगों पर इसे थोपने की कोशिश की गई तो डीएमके इसे रोकने के लिए युद्ध करने को भी तैयार है. नए चुने गए सांसद लोकसभा में अपनी आवाज उठाएंगे.

उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, मक्कल नीधि मरयम पार्टी के कमल हासन, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे, कांग्रेस नेता शशि थरूर और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी, पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया सब एकसुर में चीखे-‘हिंदी हमारे माथे पर मत थोपो…’

बवाल बढ़ा तो स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मोदी सरकार को यूटर्न लेना पड़ा और ड्राफ्ट में बदलाव करते हुए हिंदी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया. कहा जा रहा है कि अब संशोधित शिक्षा नीति के मसौदे में ‘त्रिभाषा फार्मूले’ को लचीला कर दिया गया है. अब इस में किसी भी भाषा का जिक्र नहीं है. छात्रों को कोई भी 3 भाषाएं चुनने की स्वतंत्रता दे दी गई है. सरकार को मामले की लीपापोती भी करनी पड़ी है.

आखिर जिस मुद्दे पर आजादी के पहले से ले कर आजादी के बाद तक कभी पूरे देश में एकराय नहीं बनी, ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर इतनी जल्दबाजी दिखा कर केंद्र सरकार को मुंह की तो खानी ही थी.

जबरन थोपा जाना

सर्वविदित है कि कोई चीज जबरन थोपा जाना किसी को पसंद नहीं आता और न ही स्वीकार्य होता है. सवाल यह है कि अगर यह सिर्फ मसौदा था तो इस पर बिना विचारविमर्श हुए और बिना परिणाम पर पहुंचे इस का एलान ही क्यों किया गया? राज्य सरकारों को तो छोडि़ए, इस के लिए सरकार में मौजूद अपने ही मंत्रियों तक से विमर्श नहीं किया गया और देशभर के लिए हिंदी को अनिवार्य बनाने की घोषणा कर दी गई. मोदी सरकार को लगता है कि उस ने पूरे दमखम के साथ सरकार बना ली है, तो अब उस का हर फैसला सब को मानना ही पड़ेगा.

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आखिर 5 वर्षों के बीते कार्यकाल में मोदी सरकार ने हिंदी के लिए क्या किया? देशभर में हिंदी और हिंदी संस्थानों की हालत जर्जर है. हिंदी के विद्वानों और लेखकों की कहीं कोई पूछ नहीं है. हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्र बेरोजगारी का तमगा गले में लटकाए घूम रहे हैं. वे किसी प्राइवेट संस्थान में नौकरी के लिए जाते हैं तो उन्हें हिंदीभाषी होने के कारण खुद पर शर्म आती है.

देशभर में उच्चशिक्षा का माध्यम इंग्लिश है. किताबें इंग्लिश में हैं. शिक्षक इंग्लिश में पढ़ाते हैं. वे हिंदी में बात करने वाले छात्रों को हेय दृष्टि से देखते हैं. उन के सवालों का समाधान करना तो दूर, सुनना तक नहीं चाहते. सरकारी संस्थानों का प्राइवेटाइजेशन होता चला जा रहा है जहां इंग्लिश का ही बोलबाला है. चाहे चिकित्सा का क्षेत्र हो, इंजीनियरिंग का, बिजनैस का या वकालत का, कहां है हिंदी?

सच पूछें तो आज हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाएं सौतेली हैं. इंग्लिश से ही देश का राजकाज चलता है, कारोबार चलता है, विज्ञान चलता है, विश्वविद्यालय चलते हैं, मीडिया संस्थान और सारी बौद्धिकता चलती है.

इंग्लिश का विशेषाधिकार या आतंक इतना है कि इंग्लिश में बात कर सकने वाला शख्स बिना किसी बहस के ही योग्य मान लिया जाता है. इंग्लिश में कोई अप्रचलित शब्द आए तो आज भी लोग खुशीखुशी डिक्शनरी पलटते हैं, जबकि हिंदी का ऐसा कोई अप्रचलित शब्द अपनी भाषिक हैसियत की वजह से हंसी का पात्र बना दिया जाता है. सरकारी स्कूलों की बात छोड़ दें, तो पूरे देश में पढ़ाईलिखाई की भाषा इंग्लिश ही है. गरीब से गरीब आदमी अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम में दाखिला दिलाना चाहता है.

हां, यह कहा जा सकता है कि आज हिंदी फिल्में विदेशों में खूब देखी जा रही हैं, हिंदी सीरियल हर जगह देखे जा रहे हैं, कंप्यूटर और स्मार्टफोन में हिंदी को जगह मिल गई है, इंटरनैट पर हिंदी दिख रही है. मगर ऐसा कहने वाले यह नहीं देख रहे हैं कि यह हिंदी बाजार की वजह से है, इसे सिर्फ बाजार ही बढ़ावा दे रहा है. यह सिर्फ एक बोली के रूप में इस्तेमाल  हो रही है, जो बाजार कर रहा है. हिंदी विशेषज्ञता की भाषा नहीं रह गई है, क्योंकि देश की सरकारों ने हिंदी के हित में कभी कोई काम नहीं किया.

कोशिशें नाकाम रहीं

दक्षिण भारत ने तो इंग्लिश भाषा पर ही निवेश किया है. दक्षिण भारतीयों ने इंग्लिश का सामाजिक विकास और आर्थिक समृद्धि की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल किया है और तरक्की पाई है. सौफ्टवेयर के क्षेत्र में दक्षिण भारत का योगदान अतुलनीय है और यह इंग्लिश के बिना पूरा नहीं हो सकता था. दूसरी ओर हिंदी बोलने वाले लोग दक्षिण के राज्यों में खेतिहार मजदूर के रूप में काम करने के लिए जाते थे और आज भी जाते हैं. लिहाजा उन के द्वारा बोली जाने वाली भाषा को तमिल अपने सिरमाथे पर उठाएंगे, ऐसा सोचना भी मूर्खता है.

दक्षिण में हिंदी को अनिवार्य बनाने की बहुत कोशिश की गई और हिंदी ने हमेशा मुंह की खाई. दरअसल, जिस देश में हर दो कोस पर पानी और वाणी बदलती हो, वहां एक भाषा को अनिवार्य करने का सपना पालना ही मूर्खता है. दक्षिण भारत से हिंदी का झगड़ा बहुत पुराना है.

जब वर्ष 1928 में मोतीलाल नेहरू ने हिंदी को भारत में सरकारी कामकाज की भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था, तो उस वक्त ही तमिल नेताओं ने इस का घोर विरोध किया था. करीब 9 वर्षों बाद 1937 में तमिल नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने मद्रास राज्य में हिंदी लाने का समर्थन किया और हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव दिया. अप्रैल 1938 में मद्रास प्रैसिडैंसी के 125 सैकंडरी स्कूलों में हिंदी को कंपलसरी लैंग्वेज के तौर पर लागू भी कर दिया गया. मगर इस के खिलाफ आवाजें उठने लगीं.

राजगोपालाचारी के इस फैसले के खिलाफ सब से पहले मोरचा लिया तमिल शिक्षाविदों ने. उन का आरोप था कि सूबे की कांग्रेस सरकार हिंदी के जरिए तमिल का गला घोंट रही है. इस आंदोलन के दौरान तमिल समर्थक उन स्कूलों के दरवाजे घेर कर बैठ गए, जहां हिंदी पढ़ाए जाने का प्रस्ताव था.

जो 2 नेता इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे वे आगे आने वाले समय में तमिल अस्मिता आंदोलन का चेहरा बन गए. इस में पहले थे ई वी रामासामी ‘पेरियार’ और दूसरे थे सी एन अन्नादुरई. विरोध हिंसक झड़पों में बदल गया. 2 साल चले आंदोलन के बाद आखिरकार सरकार को अपने पैर खींचने पड़े और हिंदी को कंपलसरी भाषा के तौर पर लागू करने का फैसला वापस लेना पड़ा.

आजादी के वक्त भाषाओं के आधार पर राज्यों के विभाजन को ले कर कांग्रेस के भीतर आम सहमति बनी थी. महात्मा गांधी ने 10 अक्तूबर, 1947 को अपने एक सहयोगी को लिखी चिट्ठी में कहा था, ‘मेरा मानना है कि हमें भाषिक प्रांतों के निर्माण में जल्दी करनी चाहिए… कुछ समय के लिए यह भ्रम हो सकता है कि अलगअलग भाषाएं अलगअलग संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन यह भी संभव है कि भाषिक आधार पर प्रदेशों के गठन के बाद यह गायब हो जाए.’ दक्षिण भारत के तमाम प्रांत लगातार हिंदी का विरोध करते रहे. वे अपनी क्षेत्रीय भाषा और इंग्लिश को ही ज्यादा महत्त्व देते रहे.

दोषी कौन

हिंदी के खिलाफ तमिलनाडु के मुखर विरोध की अभिव्यक्तियां बाद में महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल में भी सुनाई देने लगीं. वे लोग मानते थे और आज भी मानते हैं कि उन के क्षेत्र में उन की भाषा, हिंदी के मुकाबले कहीं ज्यादा प्राचीन व समृद्ध है. पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी सी राय भी बांग्लाभाषियों पर हिंदी थोपे जाने के सख्त खिलाफ थे.

दक्षिण भारत में हिंदी के खिलाफ उठे इस तूफान को देखते हुए तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी को राजभाषा अधिनियम में तुरंत संशोधन करना पड़ा था और इंग्लिश को सहायक राजभाषा का दर्जा दे कर अमल में लाया गया था. यही नहीं, तमाम विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री को जनता से क्षमायाचना तक करनी पड़ी थी और तमाम तरह के आश्वासन देने पड़े थे.

आजादी के इतने वर्षों बाद भी यदि हिंदी दक्षिण भारतीयों का मन नहीं मोह पाई है, तो इस की दोषी केंद्र सरकार

ही नहीं, हिंदीभाषी प्रदेश भी हैं. गैरहिंदीभाषी प्रदेशों में छात्रों ने तमिल, तेलुगू, मराठी, बांग्ला के साथ इंग्लिश और हिंदी पढ़ी. मगर हिंदीभाषी प्रदेशों में तेलुगू, तमिल, मराठी या बांग्ला कोई नहीं पढ़ता, बल्कि वहां के छात्र तीसरी भाषा के तौर पर संस्कृत को अपनाते हैं, जो देश के किसी भी हिस्से में प्रमुखता से नहीं बोली जाती है.

जब आप दक्षिण की भाषाओं के प्रति उपेक्षा बरतते हैं तो उस से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह आप की भाषा को सिरमाथे पर लेगा? संस्कृत को ‘त्रिभाषा फार्मूले’ में फिट कर हिंदीभाषी प्रदेशों ने गैरहिंदीभाषी प्रदेशों से अपनी जो दीवार बढ़ाई, वह लगभग अक्षम्य है. आज अगर हिंदीभाषी भी बड़ी तादाद में तमिल, तेलुगू, मराठी या बंगाली बोल रहे होते, तो बीते 70 सालों में हिंदी का विरोध काफी कम हो चुका होता. लोग वैचारिक रूप से एकदूसरे के करीब आ गए होते. मगर यह नहीं हुआ. उत्तर भारतीय नेताओं ने ऐसा होने नहीं दिया. इसलिए, ‘त्रिभाषा फार्मूले’ के ताजा प्रस्ताव पर विरोध फिर से भड़क उठा है.

संघ का दबाव

संघ के दबाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदू राष्ट्र की स्थापना का सेहरा अपने सिर बांधने को उतावले हैं, इसलिए पहले कदम के तौर पर हिंदी को पूरे देश में अनिवार्य करने की तेजी दिखा दी, बगैर जमीनी हकीकत को समझे. वे नहीं जानते कि हिंदू राष्ट्र की घोषणा करना तो बहुत आसान है, परंतु इस के पेंच बेहद खतरनाक हैं. मुख्य खतरा है कि यह कदम भारत को पाकिस्तान की तरह एक धर्मशासित देश में बदल देगा.

उल्लेखनीय है कि साल 2008 तक नेपाल देश धरती का इकलौता हिंदू राष्ट्र था. मगर वहां भी क्षत्रिय राजवंश का खात्मा हुआ और 2008 में नेपाल गणतंत्र बन गया. नेपाल को हिंदू राष्ट्र भी सिर्फ  इसलिए कहा जाता था क्योंकि हिंदू संहिता मनुस्मृति के अनुसार कार्यकारी सत्ता का स्रोत राजा था. इस के अलावा वहां धार्मिक ग्रंथ की कोई और बात लागू नहीं थी क्योंकि वह ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ के खिलाफ होती. बावजूद इस के, नेपाल को अपनी हिंदू राष्ट्र की छवि को तोड़ कर गणतंत्र का रास्ता अख्तियार करना पड़ा.

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संविधान के रचयिता डा. अंबेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान और दि पार्टिशन औफ इंडिया’ (1940) में चेताया है कि अगर हिंदू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सब से बड़ा अभिशाप होगा. हिंदू कुछ भी कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समता और बंधुता के लिए खतरा है. इस आधार पर वह लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाता है. हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए. डा. अंबेडकर यह बात बहुत साफतौर पर समझते थे कि हिंदू राष्ट्र का सीधा अर्थ द्विज वर्चस्व की स्थापना था, यानी ब्राह्मणवाद की स्थापना. वे हिंदू राष्ट्र को मुसलमानों पर हिंदुओं के वर्चस्व तक सीमित नहीं करते हैं, जैसा कि भारत के प्रगतिशील वामपंथी या उदारवादी लोग करते हैं. उन के लिए हिंदू राष्ट्र का मतलब मुसलमानों के साथ दलित, ओबीसी और महिलाओं पर भी द्विजों यानी ब्राह्मणों के वर्चस्व की स्थापना का था.

क्या है त्रिभाषा फार्मूला

त्रिभाषा फार्मूला यानी 12वीं कक्षा तक के सिलेबस में 3 भाषाओं को शामिल किया जाना. 1948 में भारत में भाषा के आधार पर राज्यों को बांटने के आंदोलन हो रहे थे. ठीक उसी समय यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन ने पढ़ाईलिखाई के लिए 3 भाषाओं का फार्मूला दिया था. इस के अनुसार इंग्लिश, हिंदी के अलावा एक स्थानीय भाषा भी पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने का प्रावधान किया गया. यह व्यवस्था स्विट्जरलैंड और नीदरलैंड के सिलेबस को देख कर तैयार की गई थी. वर्ष 1964 में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के चेयरमैन दौलत सिंह कोठारी के नेतृत्व में त्रिभाषा फार्मूले के लिए एक कमीशन बनाया गया. इस कमीशन ने 1966 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. वर्ष 1968 में भारतीय संसद ने कोठारी कमीशन की सिफारिश के आधार पर ‘त्रिभाषा फार्मूले’ को स्वीकार कर लिया. उस समय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री अन्नादुरई थे. अन्नादुरई ने इस के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और तमिलनाडु के सरकारी स्कूलों से हिंदी भाषा को हटा दिया.

दक्षिणी राज्यों के कड़े विरोध के चलते एजुकेशन पौलिसी में त्रिभाषा फार्मूले को खारिज कर दिया गया. फिर साल 1990 में उर्दू के मशहूर लेखक अली सरदार जाफरी के नेतृत्व में त्रिभाषा फार्मूले पर विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई गई. इस कमेटी ने अपनी सिफारिश में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लिए अलगअलग त्रिभाषा फार्मूले की सिफारिश की. इस के अनुसार उत्तर भारत में हिंदी, इंग्लिश के अलावा तीसरी भाषा के तौर पर उर्दू या संस्कृत को शामिल किया गया, वहीं दक्षिण भारत में हिंदी और स्थानीय भाषा के अलावा इंग्लिश को शामिल किए जाने की बात कही गई. वर्ष 1992 में भारत की संसद ने इस को स्वीकार कर लिया. लेकिन गौरतलब बात यह है कि भारतीय संविधान के अनुसार शिक्षा राज्यों का विषय है. ऐेसे में कोई भी राज्य त्रिभाषा फार्मूले को लागू करने के लिए बाध्य नहीं है.

 हिंदी का विरोध क्यों करते हैं तमिल

भारत गणराज्य में अनेक भाषाएं हैं. ब्रिटिश राज के दौरान इंग्लिश आधिकारिक भाषा थी. जब 20वीं शताब्दी के शुरू में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में तेजी आई, तो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विभिन्न भाषाई समूहों को एकजुट करने के लिए हिंदी को आमभाषा बनाने के प्रयास किए गए. 1918 की शुरुआत में महात्मा गांधी ने ‘दक्षिण भारत प्रचार सभा’ (दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए संस्थान) की स्थापना की.

वर्ष 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी कार्यवाही करने के लिए इंग्लिश से हिंदी की ओर रुख किया. महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू दोनों हिंदी के समर्थक थे और कांग्रेस भारत के गैरहिंदीभाषी प्रांतों में हिंदी की शिक्षा का प्रचार करना चाहती थी. लेकिन हिंदी को आमभाषा बनाने का विचार दक्षिण के महान चिंतक, विचारक और नेता ई वी रामासामी ‘पेरियार’ को कभी स्वीकार्य नहीं था. किसी भी किस्म की अंधश्रद्धा, कूपमंडूकता, जड़ता, अतार्किकता और विवेकहीनता पेरियार को स्वीकार नहीं थी. वर्चस्व, अन्याय, असमानता, पराधीनता और अज्ञानता के हर रूप को उन्होंने चुनौती दी. दक्षिण भारत में पेरियार को भगवान की तरह पूजा जाता है और उन के विचारों को बड़ा सम्मान प्राप्त है.

पेरियार ने दक्षिण में हिंदी के प्रसार को तमिलों को उत्तर भारतीयों के अधीन एक प्रयास के रूप में देखा. उन्होंने कहा कि ब्राह्मण तमिलों पर हिंदी और संस्कृत थोपने का प्रयास कर रहे हैं. उन्होंने इस के खिलाफ आंदोलन किए, जिन्हें तमिलभाषी मुसलमानों का भी सहयोग मिला.

पेरियार के हिंदीविरोधी विचार के आधार में, दरअसल, हिंदुओं का धर्मग्रंथ रामायण था, जिसे पेरियार ने कभी धार्मिक किताब नहीं माना. उन का कहना था कि यह एक विशुद्ध राजनीतिक पुस्तक है, जिसे ब्राह्मणों ने दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा है. यह गैरब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व को कायम करने वाला एक उपकरण मात्र है.

उन्होंने कहा कि रामायण को इस चतुराई के साथ लिखा गया है कि ब्राह्मण दूसरों की नजर में महान दिखें, महिलाओं को इन के द्वारा दबाया जा सके तथा उन्हें दासी बना कर रखा जा सके. रामायण में जिस लड़ाई का वर्णन है, उस में उत्तर का रहने वाला कोई भी (ब्राह्मण) या आर्य (देव) नहीं मारा गया. वे सारे लोग, जो उस युद्ध में मारे गए, वे तमिल थे, जिन्हें राक्षस कहा गया.

पेरियार ने कहा कि दक्षिण में हिंदी का प्रसार ब्राह्मणों के धर्मग्रंथों, रूढि़यों तथा ‘मनुस्मृति’ को तमिल समाज पर थोपना है, जो कि तमिलों के लिए अपमानजनक है. हिंदी की अनिवार्य शिक्षा को ले कर द्रविड़ आंदोलन का दशकों लंबा विरोध ब्राह्मणवाद, संस्कृत के प्रभुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिए जाने के खिलाफ वैचारिक लड़ाई पर आधारित था. दक्षिण भारतीयों ने हमेशा संस्कृत को ब्राह्मणवादी हिंदू धर्मग्रंथों के प्रसार की सवारी के तौर पर ही देखा, जो जातिगत एवं लैंगिक ऊंचनीच की व्यवस्था को बनाए रखने का काम करती है.

तमिलनाडु में हिंदी का विरोध इस आधार पर भी है कि आधुनिक, उपयोगी और प्रगतिशील ज्ञान यानी विज्ञान, तकनीक और तार्किक विचारों को हासिल करने की दृष्टि से हिंदी समर्थ भाषा नहीं है. भले ही तमिलनाडु अपने कुशल श्रमबल के लिए पर्याप्त अच्छी नौकरियां पैदा कर पाने में समर्थ नहीं हो पाया है, लेकिन इंग्लिश शिक्षा में निवेश ने तमिलियों के अंतर्राष्ट्रीय प्रवास को मुमकिन बनाया है.

सर्वविदित है कि इंग्लिश भाषा के ज्ञान के कारण ही भारतीय सौफ्टवेयर कंपनियां कम लागत वाले प्रोग्रामिंग पेशेवरों की मौजूदगी का फायदा उठा पाईं और वैश्विक बाजार में अपने लिए जगह बना सकीं. यहां से बड़ी संख्या में लोग अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में गए हैं.

तमिलनाडु के लोगों की सोच के अनुसार हिंदी उतनी पुरानी और समृद्ध भाषा नहीं है जितनी तमिल और बांग्ला भाषाएं हैं. उन का कहना है कि आखिर वे अपने पास पहले से मौजूद एक आला दर्जें की भाषा को एक अविकसित व दोयम दर्जे की भाषा के लिए क्यों छोड़ दें.

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