Clean Energy: ईरान युद्ध के बाद दुनिया के देशों में तेल और गैस सप्लाई में धीरे-धीरे सुधार होने लगा है. पेट्रोल, डीजल और एलपीजी अब आसानी से मिलने लगी है. इससे ऊर्जा संकट की एक बड़ी आशंका फिलहाल टल गई है. लेकिन भारत के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है. विकसित हो रहा अल नीनो देश के बिजली क्षेत्र, विशेषकर पवन ऊर्जा उत्पादन पर गंभीर असर डाल सकता है.
बताते चलें कि अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है. यह घटना आमतौर पर 2 से 7 वर्ष के अंतराल पर होती है और लगभग 9 से 12 महीने (कभी-कभी इससे अधिक) तक रह सकती है. इसका प्रभाव दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है, विशेषकर भारत के मानसून पर. अल नीनो वाले वर्ष में बारिश कम होने की संभावना भी बढ़ जाती है.
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष मानसून के दौरान हवाओं की रफ्तार सामान्य से कम रहने की संभावना है. चूंकि जून से सितंबर का समय भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण मौसम होता है, इसलिए हवा की गति में कमी सीधे बिजली उत्पादन को प्रभावित करेगी. देश में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता 56.8 गीगावाट है, जो कुल 520 गीगावाट बिजली उत्पादन क्षमता का 10 प्रतिशत से अधिक है. सामान्य परिस्थितियों में पवन परियोजनाओं का कैपेसिटी यूटिलाइजेशन फैक्टर (CUF) लगभग 38 प्रतिशत रहता है, लेकिन इस बार इसके घटकर करीब 31 प्रतिशत तक आने की आशंका है.
गुजरात, मध्य प्रदेश और अन्य प्रमुख पवन ऊर्जा उत्पादक राज्यों में बारिश और तेज हवाओं दोनों के कमजोर रहने का अनुमान है. यदि ऐसा हुआ तो बिजली की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्रों पर निर्भरता बढ़ानी पड़ेगी. इससे कोयले की खपत, बिजली उत्पादन लागत और राष्ट्रीय ग्रिड तीनों पर दबाव बढ़ेंगे.
चुनौती इसलिए भी गंभीर है क्योंकि कमजोर मानसून का असर जलविद्युत परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है. अच्छी बारिश नहीं होने से जलाशय पूरी तरह नहीं भरेंगे, जिससे हाइड्रो पावर उत्पादन भी प्रभावित होगा. दूसरी ओर केंद्रीय बिजली प्राधिकरण ने इस वर्ष देश में अधिकतम बिजली मांग 272 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान लगाया है, जो अब तक के रिकॉर्ड स्तर के करीब है.
विशेषज्ञों का कहना है कि 1997-98 और 2015-16 जैसे मजबूत अल नीनो वर्षों में भी भारत के अधिकांश पवन ऊर्जा क्षेत्रों में हवा की उपलब्धता में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई थी. इस बार भी अगस्त से अक्टूबर के बीच अल नीनो के और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है.
अल नीनो ऐसे समय में सामने आया है जब भारत का पवन ऊर्जा क्षेत्र पहले से कई समस्याओं से जूझ रहा है. पवन ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार के लिए भूमि अधिग्रहण में देरी, ट्रांसमिशन ग्रिड की सीमित क्षमता, बिजली खरीद समझौतों में बाधाएं, परियोजनाओं की धीमी स्वीकृति, ऊर्जा भंडारण (बैटरी स्टोरेज) का अभाव और अब अल नीनो का दबाव बिजली संकट को बढ़ाने वाला है.
प्राकृतिक परिस्थितियां ठीक न हुईं तो देश की बिजली व्यवस्था पर दोहरा दबाव पड़ेगा. स्पष्ट है कि बढ़ती ऊर्जा की मांग और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में भारत को केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर नहीं बल्कि ऊर्जा स्रोतों के बेहतर प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल रणनीतियों पर भी तेजी से काम करना होगा. यदि देश समय रहते ग्रिड, भंडारण और पूर्वानुमान प्रणालियों को मजबूत नहीं करता तो अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएं ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों तीनों के लिए गंभीर जोखिम बन सकती हैं. भारत के लिए अब यह समय केवल अधिक मेगावाट जोड़ने का नहीं बल्कि अधिक लचीली और जलवायु-अनुकूल ऊर्जा व्यवस्था बनाने का है. Clean Energy





