Jain Organizations: धर्म और उसके दुकानदारो यानी साधु , संतों और मुनियों बगैरह के पाखंडों और दिखावो की आलोचना होते रहना बहुत जरुरी है नहीं तो ये और बेलगाम होकर मनमानी करने लगते हैं. लेकिन यह खिंचाई बजाय अनुमानों के तर्कों और तथ्यों पर आधारित हो तो कोई वजह नहीं कि अनुयायी किसी तरह का एतराज जता पाएं. पूर्व केन्द्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्त्ता मेनका गाँधी के इस बयान पर जैन धर्माबलम्बी तिलमिलाए हुए हैं कि साल 1972 में वन्य जीव संरक्षण अधिनयम लागू किया गया था तब दिगंबर जैन भिक्षुओ को पिच्छी बनाने के लिए मोर पंखों के इस्तेमाल की छूट दी गई थी.
बकौल मेनका इस छूट के चलते मोर पंखों की व्यावसायिक मांग बढ़ गई है और उसके इर्द गिर्द एक विशाल उद्योग का निर्माण हो गया है जो राष्ट्रीय पक्षी को नुकसान पहुंचा रहा है. जिससे मोर का अवैध शिकार हो रहा है. मेनका ने याद दिलाया कि उन्होंने साल 2001 में कानून में बदलाव की मांग की थी. बस इतना सुनना था कि जैन समुदाय के लोग भडक गए जिनमे विश्व जैन संगठन और भारतीय जैन मिलन प्रमुख हैं. उन्होंने कोर्ट जाने की भी धौंस दी और प्रधानमन्त्री से मेनका के बयान की जांच करने की भी मांग की.
जैनियों की दलील यह है कि जैन धर्म अहिंसा को मानने बाला है और मुनियों की पिच्छी प्राकृतिक रूप से झड़े मोर पंखों से बनाई जाती है . यह कहना गलत है कि इसके लिए मोरों को मारा जाता है. लड़ाई अब इस मरियल से मुद्दे में सिमट कर रह गई है बाजार में जितने भी मोरपंख हैं वे प्राकृतिक रूप से झड़े हुए पंखों के हैं या नहीं या वाकई में मोरों का शिकार किया जाता है.
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