स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती उर्फ कृष्णपाल सिंह ने कंधे पर पड़े रामनामी को उतार कर झाड़ा और मुसकरा कर फिर से अपने गले में लपेट लिया, मानों साफे पर थोड़ी गंद पड़ गई थी, जो झटकते ही साफ हो गई.

होंठों पर विजयी मुसकान लिए और ऐंठ के साथ चलते चिन्मयानंद की भावभंगिमा यह बताने के लिए काफी थी कि हम भले ही आकंठ पाप के समंदर में उतर जाएं, लेकिन हमारा कोई कुछ नहीं बिगाङ सकता.

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