धर्म का चश्मा पहन कर सोच भी अंधी हो जाती है. रायपुर (भाटापाड़ा) के गांव टेहका में 3 आंखें, 2 नाभि व सिर पर एक मांस के पिंड के साथ बच्चे का जन्म हुआ. उसे देखने के लिए सैकड़ों लोग वहां जा पहुंचे और खूब चढ़ावा चढ़ा, क्योंकि गणेश पक्ष की समाप्ति व पितृ पक्ष के लगते ही बच्चे का जन्म उसे देवता की श्रेणी में ले आया था. इस में कुदरत की चूक पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.

इस मसले पर मनोवैज्ञानिक डाक्टर विचित्रा दर्शन आनंद कहती हैं, ‘‘सवाल न करने की सोच ही इनसान की शख्सीयत उभारने में सब से बड़ी बाधक होती है और इसे जन्म देता है वह माहौल, जिस में कोई शख्स पलताबढ़ता है.

‘‘तभी तो आज भी काला जादू से बीमारी ठीक करने की बात पर विश्वास किया जाता है. मिसाल के तौर पर तिलक हजारिका (जादूगर) ने एक शख्स की पीठ पर थाली चिपका दी और उस की तकलीफ दूर करने का दावा किया.’’

तर्कशास्त्री सीवी देवगन ने काला जादू होने की बात को नकारा है. इसे एक चालबाजी बताया है.

कुछ महीने पहले टैलीविजन पर एक शख्स लटकन बाबा ने भविष्यफल व अचूक उपाय बताने के नाम पर अपनी किस्मत चमका ली. उस बाबा ने कहा कि शंकरजी पर चढ़ा बेलपत्र ले कर उस पर भभूत लगाएं और उस का तावीज बना कर गले में डाल लें. आप के सारे रुके काम पूरे हो जाएंगे.

इस से ज्यादा मजाकिया बात और क्या होगी? फिर भी लोग पाखंड के कामों से जुड़े रहते हैं. अपने दिमाग का छोटा सा हिस्सा भी इस्तेमाल में नहीं लाते, तभी तो ऐसे बाबाओं की तादाद में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.

भक्ति या भरमजाल

कुछ समय पहले ‘राधे मां’ का बिगुल बजा था. लाखों भक्तों ने ‘राधे मां’ नामक औरत को देवी का दर्जा दे कर उस की पूजा की. एक से बढ़ कर एक विवादों से घिरी यह ‘राधे मां’ हाथ में त्रिशूल, माथे पर बड़ा लाल टीका, नाक में नथनी पहन कर भक्तों के आकर्षण का केंद्र बन गई.

क्या है असलियत

पंजाब में गुरुदासपुर की सुखविंदर कौर शादी के बाद घर चलाने के लिए कपड़े सिलती थी. 21 साल की उम्र में सुखविंदर कौर गुरु की शरण में जा पहुंची. वहां उस का नामकरण ‘राधे मां’ हुआ और ‘राधे मां’ के भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी. इन में सिनेमा जगत व दूसरी हस्तियां भी शामिल हो गईं.

यह ‘राधे मां’ कभी भक्तों के बीच झूमती और भक्ति के जोश में किसी भक्त की गोद में चढ़ जाती. आशीर्वाद दे कर उस भक्त की मनोकामना पूरी करती.

आस्था के मायाजाल में लिपटी जनता ‘राधे मां’ के जयकारे लगाते कई बार देखी गई. कभी यही ‘राधे मां’, लाल मिनी स्कर्ट में कहर बरपाती देखी गई. इस का अपना दरबार सजता था.

वकील फाल्गुनी ब्रह्मभट्ट ने विरोध किया कि यह औरत धर्म के नाम पर लोगों को ठग रही है.

एक और बाबा

‘सारथी बाबा’, जिस की करोड़ों की जायदाद है. गंजाम, ओडिशा में वह साधुगीरी कर धनदौलत के नशे में डूबा हुआ है.

‘सारथी बाबा’ का असली नाम संतोष राउल है. घर से भाग कर 7 साल भटकने के बाद साल 1992 में केंद्रपाड़ा, ओडिशा में अपना आश्रम खोला. यह बाबा प्रवचन देने के बजाय रंगरलियां मनाता रहा और बीयर बेचता रहा. बाद में पुलिस ने इसे गिरफ्तार किया और अब इस पर केस चल रहा है.

‘हीलिंग बाबा’ के नाम से मशहूर सैबेश्चियन मार्टिन मुंबई के ठाणे इलाके में एक ‘आशीर्वाद प्रार्थना केंद्र’ चला रहा था. यह बाबा मरीज को अपने सामने खड़ा करता है और अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कर कुछ बुदबुदाता है. कुछ ही देर में वह मरीज खड़ेखड़े ही गिर जाता है, मतलब उस की बीमारी दूर हो गई.

इस ‘हीलिंग बाबा’ ने जन्म से अंधी एक लड़की की आंखें ठीक करने का दावा किया. इस के अलावा पुष्पा नाम की औरत की दोनों खराब किडनी को ‘जीसस’ की दुहाई दे कर ‘हीलिंग बाबा’ ने ठीक करने का दावा किया.

पिछले 10 साल से यह केंद्र चल रहा है, पर अब पुलिस ने इस केंद्र के 2 लोगों को गिरफ्तार किया है और ‘हीलिंग बाबा’ खुद एक अस्पताल में भरती हो गया.

अब सोचने वाली बात यह है कि जो आदमी किडनी ठीक कर सकता है, आंखों में रोशनी ला सकता है, वह अपना इलाज क्यों नहीं कर पाया?

जानलेवा प्रथा

3 सौ सालों से चल रहा 2 गांवों के बीच खुलेआम मौत का खूनी खेल ‘गोटमार उत्सव’ बड़े ही जोश के साथ मनाया जाता है. कहा जाता है कि छिंदवाड़ा के पांडुरना गांव का एक लड़का और सांवर गांव की एक लड़की भाग कर नदी पार कर रहे थे, तभी गांव वालों ने देख लिया और दोनों को पत्थर मारमार कर मार डाला.

तभी से यह ‘गोटमार उत्सव’ के रूप में भादों मास के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है. इस में हर साल काफी लोग घायल होते हैं और कुछ की मौत भी हो जाती है.

प्रशासन इसे रोकने में नाकाम रहा है. इस के लिए धारा 144 भी लगाई गई, लोगों के खिलाफ रबड़ की गोलियां भी चलाई गईं, पर यह उत्सव न रुक पाया.

अब उत्सव वाले दिन प्रशासन की तरफ से एंबुलैंस वहां रहती है, जो घायलों को अस्पताल ले जाने का काम करती है.

अभी हाल ही में सिंहस्थ, उज्जैन में कुंभ मेले में साधुसंतों में गोलीबारी और तलवारबाजी हुई. कई साधुसंन्यासी तो चोटिल हो कर अस्पताल पहुंच गए.

सोचने की बात यह है कि साधुसंत मोहमाया से दूर रहने की बात करते हैं, पर खुद गुटबाजी में लिप्त हैं और लड़मर रहे हैं.

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भी चढ़ावे के बंटवारे के चक्कर में वहां के पंडों को हाथापाई करते देखा गया था.

ऐसी घटनाएं देखसुन कर भी जनता की आंखें क्यों नहीं खुलतीं? ऐसी सोच पर दुख होता है. धर्म की आड़ में धर्म के ठेकेदार जनता को यों ही बहलातेफुसलाते रहेंगे, पर जनता कब तक दिमाग की खिड़की बंद किए उन के पीछेपीछे चलती रहेगी?             

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