सैकड़ों सालों की गुलामी के जबड़े से निकलने के बाद भी हिंदू समाज न तो अंधविश्वास की दलदल से बाहर निकल पाया है और न ही इस ने अपने चारों तरफ फैले पाखंडों के तानेबाने को तोड़ने का प्रयास ही किया है. दूरदराज के इलाकों में रहने वाले पिछड़े समाज को तो छोडि़ए जहां अंधविश्वास पनपने की वजह अशिक्षा माना जाता है, अत्याधुनिक शहरों के उच्च शिक्षित लोग भी अंधविश्वासों के भंवर में भटक रहे हैं. अंधविश्वास के जाल में अनपढ़ लोग उलझ कर रह जाएं, यह बात तो गले उतरती है लेकिन अच्छेखासे पढ़ेलिखे, समझदार लोग भी अंधविश्वास को गले लगा लें तो हैरानी होती है. पितरों को मनाने के नाम पर समाज में पंडितों के पाखंडों का गोरखधंधा धड़ल्ले से चल रहा है. इसे देख कर यह यकीन ही नहीं होता कि हम आईटी व वाईफाई की क्रांति के दौर में जिंदगी जी रहे हैं. यों तो भारत में रह रहे लोगों का हर महीना, हर घड़ी, हर दिन ही अंधविश्वासों व कुरीतियों को निभाने में गुजरता है, लेकिन अश्विन पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक के 15 दिन मरे हुए पूर्वजों को फिर से जिंदा अनुभूत करने के दिन होते हैं. इस पखवाड़े में हिंदू अपने मृत मातापिता, दादादादी आदि की स्मृति में ब्राह्मणों को भोजन करा कर दानदक्षिणा आदि देते हैं.

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