जब कोई योगगुरु या आध्यात्मिकता के नाम पर साम्राज्य स्थापित करने वाला मरता है तो कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं. कुछ समय पहले की बात है. सत्य साईं बाबा के नाम से जाने जाते सत्यनारायण राजू को गंभीर हालत में सुपर स्पैशियलिटी अस्पताल में जब भरती करवाया गया था तब उन के गुरदे, लिवर, फेफड़े आदि जवाब देने लगे थे, सांस में दिक्कत होने लगी थी, रक्तचाप बहुत नीचा हो गया था और दवाओं ने असर करना बंद कर दिया था. ऐसा किसी भी 86 वर्षीय व्यक्ति के साथ हो सकता है, वह चाहे कोई भी हो. पर जब यह सब साईं बाबा के साथ हुआ तब उन के भक्तों को बड़ा ताज्जुब हुआ, क्योंकि वे सारी उम्र हवा में से भभूत पैदा करने का दावा करते रहे थे. कई तो उन के चित्र में से भी भूत निकलने का दावा किया करते थे. गनीमत है कि उन के शव से भभूत नहीं निकली. भभूतवाद भभूत अर्थात राख को चमत्कारी दवा या आशीर्वाद के तौर पर न वेदों में कहीं प्रयुक्त किया गया है, न उपनिषदों में. यहां तक कि रामायण, महाभारत, गीता आदि में भी राख को कोई महत्त्व नहीं दिया गया है. फिर यह राखवाद की दवा कहां से टपक पड़ी?

यह उन सिद्धों, नाथों और योगियों के संप्रदायों से उत्पन्न हुई है जिन का प्रामाणिक और शास्त्रीय हिंदूधर्म में कोई स्थान नहीं है. ये लोग अकसर हिंदू आबादी से दूर वनों में बड़ा सा धूना लगा कर बैठा करते थे और आग के पास बैठ कर किसी मंत्र का जाप करते हुए शरीर के तपाने, विशेषतया धूप और ग्रीष्म ऋतु में, को तप करना कहते थे. धीरेधीरे इन लोगों ने उदरपूर्ति के लिए यह प्रचार शुरू कर दिया कि उन के मंत्रजाप से वह धूनी (अग्नि) भी अलौकिक शक्तिसंपन्न हो जाती है जिस के पास वे जप करते हैं और उस की राख भी. इसलिए कई योगियों ने भस्म (राख) से तिलक लगाना शुरू कर दिया तो दूसरों ने सारे शरीर पर इसे मलना शुरू कर दिया. यही बाद में आशीर्वाद के तौर पर और दवा आदि के लिए बांटी जाने लगी. राखवादियों ने यह प्रचार किया कि जो इस भस्म को धारण करता है उस से तो मृत्यु भी डरती है. स्वामी दयानंद सरस्वती ने टिप्पणी की है, ‘‘जब रुद्राक्ष भस्म धारण से यमराज के दूत डरते हैं, तो पुलिस के सिपाही भी डरते होंगे? जब रुद्राक्ष भस्म धारण करने वालों से कुत्ता, सिंह, सर्प, बिच्छू, मक्खी और मच्छर आदि भी नहीं डरते तो न्यायाधीश (यमराज) के गण क्यों डरेंगे?’’

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