Bihar Politics: बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने पटना का सरकारी आवास खाली कर दिया. इस के बाद भवन निर्माण विभाग ने मकान का निरीक्षण किया. इस खबर के साथ एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि आखिर सरकारी मकान का इतना मोह क्यों होता है? असल बात तो यह है कि सरकारी मकान सिर्फ रहने की जगह नहीं होते. राजनीति में यह सत्ता, रुतबे और ताकत की पहचान बन जाते हैं. बंगले, सुरक्षा, सरकारी गाड़ियां और गार्ड्स वगैरह से समर्थकों को यह संदेश दिया जाता है कि उन का नेता बेहद ताकतवर है इसलिए कई नेता सरकारी मकान छोड़ने में हिचकिचाते हैं.

बीजेपी सरकारी मकानों का भी राजनीतिक इस्तेमाल करती है. अपने पसंदीदा नेताओं को मंत्री बना कर सरकारी बंगले और दूसरी सुविधाएं देना केवल इनाम नहीं बल्कि यह राजनीतिक संदेश देने का तरीका भी होता है. इस से समर्थकों के बीच नेता की यह छवि बनाई जाती है कि सत्ता पूरी तरह उस के हाथ में है.

सहयोगी दलों के नेताओं को मनपसंद सरकारी आवास दे कर उन्हें अपने साथ बनाए रखने की कोशिश की जाती है. चिराग पासवान और उन के पिता रामविलास पासवान हमेशा सत्ता के साथ गठबंधन में बने रहे इस के पीछे की असली वजह भी यही रही. बीजेपी के शाशन में सरकारी आवास, पद और सुविधाओं का इस्तेमाल नेताओं और अधिकारियों की वफादारी बढ़ाने के लिए किया जा रहा है.

इस से स्वतंत्र सोच रखने वाली नौकरशाही का पतन होना तय है. सरकारी मकान किसी पार्टी या नेता की निजी संपत्ति नहीं होते. यह जनता के टैक्स के पैसे से बनाए और चलाए जाते हैं लेकिन बीजेपी के शाशन में जनता की औकात सिर्फ वोट, दान और टैक्स देने तक की बची है. दान का पैसा किसकी जेब में गया और टैक्स के पैसों का क्या हुआ यह जानने का हक किसी को नहीं. Bihar Politics

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