ऐतिहासिक इमारतें सिर्फ पत्थर की इमारतें नहीं होतीं और न ही ये सरकार, पार्टी या किसी प्राइवेट कंपनी की प्रौपर्टी होती हैं बल्कि ये इमारतें इतिहास, कल्चर और समाज की साझा विरासत होती हैं. इनकी देखभाल, मरम्मत और सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की होती है लेकिन अगर सरकार इन पुरानी इमारतों की देखभाल और मैनेजमेंट से पल्ला झाड़ते हुए इन बेशकीमती धरोहरों को प्राइवेट कंपनियों को सौंप दे तो सवाल जरूर खड़े होते हैं.
इस का मतलब साफ है कि सरकार के नेता, अफसर, मंत्री, नौकरशाही की भारीभरकम फ़ौज, पुरातत्व विभाग के सभी लोग आराम की नौकरी कर रहे है, किसी के पास कोई जिम्मेदारी लेने की या जनहित में काम करने की तमन्ना तक नहीं है. घंटों पूजा में बैठने वाले ये लोग काम के घंटों में भी इन थोड़े से मुट्ठीभर ऐतिहासिक स्मारकों, धरोहरों की देखभाल नहीं कर सकते. अगर ऐसा है तो क्यों न इन सब को बरखास्त किया जाए. आइए जानें हो क्या रहा है.
हाल ही में दिल्ली सरकार ने भारीभरकम नाम वाली व गुमराह करने वाली ‘अवर मौन्यूमैंट्स, अवर प्राइड’ कैंपेन के तहत 2 नई स्कीमों को मंजूरी दी है. इस के तहत दिल्ली पुरातत्व विभाग के पास जो करीब 75 ऐतिहासिक स्मारक हैं, उन्हें 5 साल के लिए प्राइवेट कंपनियों, ट्रस्ट और एनजीओ को ‘स्मारक मित्र’ के तौर पर सौंप दिया जाएगा. सरकार का कहना है कि ये कंपनियां सफाई, लाइट, सिक्योरिटी, टूरिस्ट के लिए टौयलेट, कैफे जैसी सुविधाएं और मेंटिनैंस पर पैसा लगाएंगी. इस के लिए सरकार इन्हें 2 करोड़ रुपए तक की मदद देगी. सरकार का कहना है कि इस से स्मारकों की देखभाल बेहतर होगी, टूरिज्म बढ़ेगा, कंपनियों का सीएसआर फंड इस्तेमाल होगा और सरकार पर दबाव कम होगा. लेकिन बड़े सवाल यहीं से शुरू होते हैं.
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