आज 31 अगस्त 2026 को इस्तांबुल में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान की बैठक हो रही है. असल में तो यह हथियार, तेल और बम की बैठक है जिसपर मक्का का ठप्पा लगाया गया है ताकि जनता को लगे कि यह इस्लाम की हिफाजत का मसौदा है. 7 अगस्त को मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक कागज पर दस्तखत किए थे जिसका नाम रखा गया मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट. इस समझौते का मकसद था कि तीनों में से किसी एक पर हमला हुआ तो तीनों पर हमला माना जाएगा. यह नाटो के आर्टिकल 5 की सीधी नकल है. फर्क सिर्फ इतना है कि नाटो ने सेक्युलर भाषा इस्तेमाल की थी और इन्होंने इस समझौते पर धर्म का लेबल चिपका दिया है.
इस समझौते का सीधा संबंध अमेरिका-इजराइल और ईरान के युद्ध से है. पिछले छह महीने में अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के खिलाफ जो जंग छेड़ी उसमें सऊदी अरब और तुर्कीये जैसे देशों का भविष्य संकट में पड़ता नजर आया क्योंकि ईरान और इजराइल के युद्ध में खाड़ी देशों के तेल के कुओं पर हूती ड्रोन गिरने लगे. पचास अरब देशों के बीच अकेले खड़ा ईरान सुपरपावर अमेरिका और इजराल को सीधी टक्कर देने में कामयाब हुआ और अमेरिका के गुलाम खाड़ी देशों पर भारी पड़ गया. अमेरिका अपने पिट्ठूओं की हिफाजत नहीं कर पाया. सऊदी अरब को लगा कि अमेरिकी छतरी अब लीक कर रही है और तुर्किये को लगा कि नाटो में उसकी हैसियत दूसरे दर्जे की हो चुकी है इसलिए दोनों देशों को मजबूत सुरक्षा की जरूरत महसूस होने लगी.
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