जब भी महात्मा गांधी याद आते हैं तो हमें चरखा कातते हुए बापू, लाठी पकड़े हुए बापू और नोट पर छपे हुए बापू की छवि ही दिखाई पड़ती है क्योंकि स्कूल और कॉलेज से लेकर सरकारी दफ़्तरों में गांधी का यही फ्रेम नजर आता है लेकिन इस फ्रेम के पीछे एक ऐसा गांधी भी छिपा है जो आपको हैरान कर देगा. यह गांधी न तो संत था, न महात्मा. यह एक बेहद जिद्दी, भावुक और अजीबोगरीब इंसान था. आइये इस अनजाने गांधी को करीब से जानें.

दक्षिण अफ्रीका में वकालत के दिनों में उन्हें डाक टिकटों को काटकर जमा करने का जुनून था. वो अपने मुवक्किलों के लिफाफों से टिकट निकाल लेते थे और एक एलबम में चिपकाते थे. एक बार उन्होंने इस एलबम को नीलाम करके एक गरीब दलित छात्र की छह महीने की फीस जमा की थी.

समय के मामले में गांधी जी इतने सख्त थे कि अगर कोई पांच मिनट लेट आता तो वो बिना मिले उठकर चले जाते थे. एक बार एक अंग्रेज पत्रकार सात मिनट लेट आया तो उन्होंने यह कहकर इंटरव्यू रद्द कर दिया कि तुम्हारे सात मिनट ने मेरे सात दिन के काम का समय खराब कर दिया है.

गांधी जी और मधुमक्खियां

सेवाग्राम आश्रम में वो रोज सुबह एक पेड़ के पास जाते थे जहां मधुमक्खियों का छत्ता था. वहां वो दस मिनट आंख बंद करके खड़े रहते थे. पूछने पर कहते थे कि ये मेरे सबसे अनुशासित कार्यकर्ता हैं. न भाषण देती हैं, न झगड़ती हैं, बस चुपचाप काम करती हैं.

सेकुलर सोच को आजकल सिर्फ सर्व धर्म समभाव के नारे तक सीमित कर दिया गया है लेकिन गांधी का सेकुलरिज्म किताबी नहीं था बल्कि यह उनकी रोज की जिंदगी में दिखता था. वो मंदिर भी जाते थे, मस्जिद में बैठते थे और चर्च की प्रार्थना में भी शामिल होते थे लेकिन उन्होंने कभी किसी धर्म को दूसरे से बड़ा नहीं बताया. गांधी का मानना था कि धर्म इंसान को जोड़ने के लिए है, तोड़ने के लिए नहीं इसलिए उन्होंने कभी धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगा, कभी धर्म के नाम पर नफरत नहीं फैलाई.

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